आखिरकार, ज्योतिष शास्त्र की क्या उपयोगिता है ?

मेरी  पिछली पोस्ट का विषय था कि जीवन में हम लोग जो कुछ भी अपने भाग्य के द्वारा प्राप्त करते हैं,वो सब हमारे पूर्वकृ्त कर्मों का ही फल है। उन्ही पूर्वजन्मकृ्त कर्मों के फलस्वरूप इस जन्म में जो कुछ प्राप्त होना है,ज्योतिष शास्त्र तो उसे उसी रूप में दर्शाने का एक माध्यम है। जिस प्रकार एक दीपक अंधकार भरे कमरे में जला देने से उस कमरे में रखी समस्त वस्तुएं हमें आसानी से दिखलाई देने लगती हैं। ठीक उसी प्रकार हमारे भविष्य में जो कुछ भी अदृ्श्य है,ज्योतिष उसे दिखला देता है। तब श्री राजीव महेश्वरी जी ने एक प्रश्न उठाया था जिसे मैं उनके कथनानुसार वैसा का वैसा ही यहां प्रस्तुत कर रहा हूं " पंडित जी, जब मुझे अपने पूर्व जन्म के फल इस जन्म में भरने है तो फिर ज्योतिष विधा का दीपक मेरे इस जन्म में क्या परिवर्तन कर देगा. क्या में गरीब से अमीर या अमीर से ....... हो जाउगा. क्या रंग - बिरंगे पत्थर , देवी-देवताओं के व्रत , जल चढाने से मेरे पूर्वकृ्त करम बदल जायेगे ?
अगर नहीं तो फिर ज्योतिष विधा का दीपक जलने का क्या फायदा.?"


यहां मैं अपनी बात एक उदाहरण देकर कहना चाहूंगा कि मान लीजिए मैं कहीं पर नौकरी कर रहा हूं और मैने पूरा मार्च महीना कार्य किया तो अपैल माह में मुझे अपने कार्य के प्रतिफल 10000 रूपये वेतन प्राप्त हुआ यहां नौकरी करना मेरा कर्म है ओर वेतन उस कर्म का फल अब इन रूपयों को मैं बुद्धिमता से व्यय करूं तो उनसे बहुत से आगे होने वाले शुभ कर्मों का साधन उत्पन्न कर सकता हूं और यदि उसी दिन जुआ खेल कर हार जाऊं तो आज ही अपने लिए बहुत सी समस्याएं पैदा कर लूंगायह 10 हजार रूपये मेरी पिछली कमाई का फल था,जो कि मेरे प्रारब्ध(भाग्य) के अनुसार मुझे मिला है यदि केवल पिछली कमाई का ही प्रश्न होता और किसी प्रकार मेरे भविष्य का उत्तरदायित्व या कर्तृ्त्व मुझ से छीन लिया जाता और मैं ऎसी अवस्था में डाल दिया जाता कि कर्तुम,अकर्तुम और अन्यथा कर्तुं के सर्वथा अशक्त होता तो 10000 रूपये की प्राप्ती में कमी या बढोतरी न होती, परन्तु यह तो एक प्रकार से मेरे स्वाभाविक अधिकार पर कुठाराघात होता कर्तृ्त्व और उसका उतरदायित्व मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है यह 10 हजार रूपये मुझे दिए ही इसलिए गए हैं कि अगले कर्मों के लिए क्षेत्र बना सकूं अत: मेरे आगामी कर्म इस प्राप्ती को भी कम या अधिक करेंगे यहां प्राप्ती फल की है,फल से उत्पन्न होने वाले कर्मक्षेत्र की नहीं इसलिए मुझे अधिकार है कि मैं उस फल से अपने क्षेत्र को उत्कृ्ष्ठ या निकृ्ष्ट कर सकूं चाहूं तो अपने दुर्व्यसनों में फंसकर उन रूपयों को नष्ट कर दूं और कल से भीख मांगता फिरूं अथवा इस प्रकार व्यय करूं कि कल को कई गुणा अधिक साधन प्राप्त हो जायें इसी प्रकार पूर्वकृ्त कर्मों द्वारा मुझको जीवन में जो कुछ भी प्राप्त हुआ है,उसको मैं वर्तमान जन्म के आचरणों द्वारा घटा बढा सकता हूं।हवन, पूजा पाठ,दान-जाप,व्रत उपवास,किसी भूखे को भोजन कराना,गौ सेवा,मंत्र जाप इत्यादि उपाए एक प्रकार से वर्तमान के आचरण ही तो हैं, जिनके माध्यम से हम अपनी प्राप्तियों में वृ्द्धि कर सकते हैं। 
इसलिए वेद और शास्त्रों में आयु वृ्द्धि,उन्नति की वृ्द्धि और सुख की वृ्द्धि के साधन दिए गए हैंऔर रोग,ह्रास तथा दुखों को कम करने के भी साधन दिए गए हैं 
समस्त शास्त्रों की भित्ति ही इस सिद्धान्त के ऊपर है कि हम आयु, वातावरण तथा सुखों में वृ्द्धि कर सकते हैं किसी भी शास्त्र में ऎसा नहीं लिखा कि आयु नहीं बढ सकती, परिस्थितियां नहीं बदल सकती, भोगों में परिवर्तन नहीं हो सकता


आशा करता हूं कि श्री राजीव जी को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होग। अगर फिर भी इस विषय में किसी पाठक के मन में कोई शंका अथवा जिज्ञासा हो तो निसंकोच,यहां टिप्पणी के माध्यम से व्यक्त कर सकते हैं।यदि मैं उनकी शंका का निवारण करने में समर्थ हुआ तो अवश्य ही करने का प्रयास करूंगा।  
श्रीरस्तु---------------------------------शुभमस्तु--------------------------------------कल्याणमस्तु