निकल जा अकल से आगे.................

अभी पिछले दिनों मैने एक लेख के माध्यम से ये बताने का प्रयास किया था कि जीवन में हम लोग जो कुछ भी अपने भाग्य के द्वारा प्राप्त करते हैं,वो सब हमारे पूर्वकृत कर्मों का ही फल है। कल परसों कोई सज्जन मुझसे इस विषय में प्रश्न कर रहे थे कि जब सब कुछ ईश्वर द्वारा पहले से ही निर्धारित कर दिया गया है तो फिर ज्योतिष विधा का क्या औचित्य रह जाता है। वैसे ये इस प्रकार का प्रश्न है,जो कि आम तौर पर बहुत से लोगों के मन में आता होगा। लेकिन ज्योतिष शास्त्र इन प्रश्नों का निराकरण पहले ही कर देता है।
यहां मैं अपनी बात एक श्लोक के माध्यम से आरम्भ करना चाहूंगा।
यदुपजितमन्य जन्मनि शुभाशुभं कर्मण: पक्तिंम 
व्यज्जयति शास्त्रम एतद तमसि द्रव्याणि दीप इव !!
अर्थात पूर्व जन्म का ज्योतिष से बहुत ही गहरा संबंध है। पूर्वजन्मकृ्त कर्मों के फलस्वरूप इस जन्म में जो कुछ प्राप्त होना है,ज्योतिष शास्त्र उसे उसी रूप में दर्शाने का माध्यम है। जिस प्रकार एक दीपक अंधकार भरे कमरे में जला देने से उस कमरे में रखी समस्त वस्तुएं हमें आसानी से दिखलाई देने लगती हैं। ठीक उसी प्रकार हमारे भविष्य में जो कुछ भी अदृ्श्य है,ज्योतिष उसे दिखला देता है।

गीता में भी कहा गया है कि मनुष्य अपने कर्मों के बंधन में बंधा हुआ रहता है। 'कर्मानुबंधि हि मनुष्ये'
'प्रत्यक्षोपलब्धि केवलम प्रमाणम' के सिद्धांतानुसार प्रत्यक्ष जो उपलब्ध है,वही उसकी उत्पत्ति है। यहां इस ब्लागजगत में भी बहुत से अनेक विधाओं के लोग मौजूद होंगें। प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि मैं जीवन में ये कर लूंगा,वो कर लूंगा या अपनी संतान को ऎसा बनाऊंगा,वैसा बनाऊंगा। लेकिन सब लोग इस सत्य से भली भांती परिचित हैं कि न तो अपनी इच्छानुसार स्वयं उस मनोनुकूल उपलब्धी को हासिल कर पाते हैं और न ही अपनी संतान के माध्यम से उस इच्छा की पूर्ती कर पाते हैं। कोई मां-बाप नहीं चाहेगा कि हमारा बच्चा अच्छा न बने,लेकिन फिर भी बहुत से बच्चे ऎसे भी होते हैं जो जीवन में किसी मुकाम पर नहीं पहुंच पाते। आखिर ये सब क्यों होता है? कोई नहीं चाहता,लेकिन फिर भी ऎसा होता है। इसके पीछे सिर्फ एक कारण है------पूर्वजन्म के संस्कार। जिनको ज्योतिष शास्त्र बतलाने का कार्य करता है।

अक्सर इस प्रकार के प्रश्नों का सामना प्रत्येक ज्योतिषी को कभी न कभी अवश्य करना पडता है,किन्तु मैं उन लोगों का ह्रदय से आभारी हूँ जिनके सवालों ने मुझे इस शास्त्र के अंदर अधिक-से-अधिक गहराई तक जाने के लिए प्रेरित किया।साथ ही ऋणी हूं उस ईश्वर तथा गुरूजनों का,जिन्होने मुझ जैसे मूडमति को इस दैवीय ज्ञान  के लायक समझा। अन्त में सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि--------
निकल जा अकल से आगे, कि नूर, चिराग-ए-राह है, मंजिल नहीं है