नाम में बहुत कुछ रखा है !

संसार में जो विविध वस्तुएं हमें दिखाई देती हैं, उनमें पंच तत्व अर्थात पृ्थ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश तत्व समाहित हैं। उनमें तत्वों का सम्मिश्रण भिन्न भिन्न अनुपात और भिन्न भिन्न प्रकार से है। किसी में कोई तत्व कम है तो किसी में कोई अधिक,परन्तु यह समस्त जगत केवल पंच तत्वों का ही प्रपंच है। ये पंच तत्व भी मूलत: आकाश तत्व से ही उत्पन्न हुए हैं। आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृ्थ्वी। जल का गुण 'रस',पृ्थ्वी का 'गंध',अग्नि का 'तेज',वायु का 'स्पर्श' और आकाश का गुण 'शब्द' है। जैसे संसार के समस्त पदार्थों के मूल में आकाश तत्व है,उसी प्रकार हम ये कह सकते हैं कि सभी पदार्थों का मूल गुण शब्द है। इसी कारण से शब्द को ब्रह्म स्वरूप भी कहा जाता है।
परिणामत: तो सभी शब्द ब्रह्म के रूप ही हैं,किन्तु भिन्न भिन्न शब्दों का गुण और प्रभाव भी भिन्न भिन्न है और प्रत्येक शब्द को अंक या संख्या में परिवर्तित करके उसका माप किया जा सकता है।
कोई शब्द या वाक्य 11000 बार आवृ्ति करने पर पूर्णता को प्राप्त होता है तो किसी का 17000 बार आवृ्ति करने पर परिपाक होता है। संख्या और शब्द के संबंध से हमारे ऋषि-मुनि पूर्णत: परिचित थे। इसी कारण सूर्य के मंत्र का जाप 7 हजार,चंद्रमा का 11 हजार,मंगल का 10 हजार,बुध का 9 हजार,बृ्हस्पति का 19 हजार,शुक्र का 16 हजार,शनि का 23 हजार,राहू का 18 हजार तथा केतु का 17 हजार की संख्या में जाप निर्धारित किया है। किसी देवता के मंत्र में 22 अक्षर होते हैं तो किसी में 27 या किसी में 36 इत्यादि इत्यादि।
शब्द और संख्या का घनिष्ठ वैज्ञानिक संबंध है,इसी प्रकार से संख्या और क्रिया का भी आपस में संबंध है।.शून्य(0) निष्क्रिय,निराकार,निर्विकार ब्रह्म का घोतक है एक '1' पूर्ण ब्रह्म की उसस्थिति का प्रतीक है,जब वह अद्वैत रूप में रहता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि शब्द और संख्या (अंक) में संबंध होने के कारण------समस्त पदार्थों के मूल में जैसे शब्द हैं-----उसी प्रकार से अंक भी। शब्द के मूल आकाश को शून्य कहते हैं और अंकों के मूल को भी शून्य। शून्य से ही शब्द और अंक का प्रादुर्भाव होता है।
अब अगर अंक का किसी वस्तु या क्रिया से कोई संबंध न होता तो मंत्र जप हेतु हमारे शास्त्र 108 मनकों की माला बनाने का विधान नहीं रखते।
जिस प्रकार आजकल के वैज्ञानिक प्रत्येक भोज्य पदार्थ को "कैलोरी" में परिवर्तित कर के यह बताते हैं कि किस पदार्थ में कितनी शक्ति विधमान है,ठीक उसी प्रकार से किसी नाम को संख्या(अंक) में परिवर्तित करके यह बतलाया जा सकता है कि उसे नाम के व्यक्ति में कौन कौन से गुण अवगुण हैं तथा उसमें किस प्रकार की उर्जा प्रवाहित हो रही है या पंचतत्वों में से उस व्यक्ति में किस तत्व की अधिकता अथवा न्यूनता है।लेकिन इस विधा का रहस्य इतना गंभीर है कि बिना गहराई में उतरे, सिर्फ ऊपरी तौर से इसे जानना कदापि संभव नहीं है।
एक बार इस विधा के किसी ज्ञाता से मिलने बाद शायद आप भी कहने को विवश हो जाऎंगें कि "कमाल है !, नाम में तो बहुत कुछ रखा है!"