शब्द शक्ति---- मंत्र----- संस्कृ्त भाषा-------विज्ञान

मंत्रों में विशिष्ट ध्वनि वाले शब्दों का उपयोग किया जाता है। शब्दों में विविध शक्तियों का समावेश है और अनेक शब्दों के संयोजित मेल से एक विशिष्ट शक्ति की आभा प्रकट होती है।
मंत्र शब्द ध्वनियों का एक विशिष्ट संगठित रूप है, जिसके उच्चारण से वैसा ही प्रभाव उत्पन्न होता है,जैसा उस मंत्र का उदेश्य होता है।
वेदों में शब्दों की महिमा का बखूबी बखान किया गया है। शब्द को वेदों में ब्रह्मस्वरूप तथा शक्तिमान कहा गया है। मंत्रों में विभिन्न अक्षर होते हैं तथा उनकी ध्वनियां भी भिन्न भिन्न होती हैं। प्रत्येक मंत्र में प्रयुक्त शब्दों के पीछे भी एक शास्त्रीय आधार निहित है। अब जैसा कि ये बात तो सर्वविदित है कि इस सृ्ष्टि के सभी पदार्थों की रचना 5 तत्वों के द्वारा हुई है। यदि किसी पदार्थ में इन पंच तत्वों में से एक भी तत्व का अभाव हो जाता है, तो उस वस्तु का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। इसी आधार पर हमारे ऋषि-मुनियों नें संस्कृ्त भाषा के शब्दों की रचना की है। भाषा में 5 वर्ग होते हैं तथा प्रत्येक वर्ग में 5 ही अक्षर होते हैं। स्वर भी 5 तथा उनका उच्चारण करने वाले शारीरिक अवयव(कंठ,तालू,मूर्धा,दांत,होंठ) भी 5 ही हैं। संस्कृ्त के शब्दों का निर्माण तथा विभिन्न वस्तुओं को जो नाम प्रदान किए गए हैं,उनके पीछे भी यह ठोस आधार रहा है। ऋषियों नें जिन वस्तुओं एवं पदार्थों को देखा तो उनका नामकरण उनके गुण,परिणाम,उनमें व्याप्त पंच तत्वों का अनुपात एवं उनके आकार को ध्यान में रख कर संयोजित किया। मंत्रों में प्रयुक्त शब्दों के पीछे भी यही सिद्धांत काम करता है। संस्कृ्त भाषा की लिपि के अक्षरों का जैसा आकार है, उसी प्रकार की ध्वनि उनके उच्चारण करने में निकलती है। हमारे गुरू जी ने एक बार बताया था कि इसकी सत्यता जांचने के लिए एक फ्रांसिसी वैज्ञानिक नें इस लिपि में प्रयुक्त अक्षरों के जैसे लोहे के खोखले ढांचे तैयार किए तथा सभी को फूंक मारकर बजाया तो परिणाम आश्चर्यजनक थे। उन लोह अक्षरों से निकलने वाली ध्वनि वैसी ही थी,जिस प्रकार से अक्षर के उच्चारण करते समय मुख से निकलती है। अस्तु,जब मंत्र उच्चारित किए जाते हैं तो मुख के सभी अवयव (होंठ,तालू,जिव्हा आदि) की सहायता से विभिन्न शब्दों का उच्चारण किया जाता है। प्रत्येक शब्द के उच्चारण करते समय इन अवयवों की स्थिति भी भिन्न भिन्न होती है यानि किसी शब्द को बोलते समय होंठ गोलाकार हो जाते हैं,किसी में जीभ ऊपर को उठती है, इत्यादि-इत्यादि। कहने का अर्थ सिर्फ इतना ही है कि भिन्न भिन्न शब्दों को बोलते समय मुख की स्थिति भिन्न रहेगी। तथा इन अवयवों से जो शब्द उच्चारित किए जाते हैं,उनकी गतिविधियां शरीर के विभिन्न अंगों/कोषों पर अपना प्रभाव डालती हैं ओर उन्हे सुप्त अवस्था से जागृ्त अवस्था में परिणत कर देती हैं। शरीर के उन कोषों का जागृ्त होने का अर्थ है,उनका सशक्त होना,उनका विकास होना,आत्मबल का संचार या इच्छा शक्ति की वृ्द्धि होना होता है। जिन लोगों नें योग शास्त्र का अध्धययन किया हुआ है, वो लोग जानते हैं कि हम सबके शरीर में 24 विशिष्ट तथा 84 सामान्य शक्ति केन्द्र विधमान है,जो कि वर्तुल आकार में स्थित है। इन्हे उपत्यकाएं और विभेदिकाएं कहा जाता है। अब अगर आप 24 तथा 84 की संख्या को जोडें तो योगफल आता है 108 ओर हम लोग मंत्र जाप करते समय जिस माला का प्रयोग करते हैं उसके मनकों की संख्या भी 108 ही होती है,जो कि शरीर के इन शक्ति केन्द्रों के प्रतीकात्मक स्वरूप हैं। अब जब हम किसी मंत्र का उच्चारण करते हैं तो उस समय हमारे मुख से जो अक्षर ध्वनि सपंदित होती है,उसका स्वसंचालित सूक्ष्म प्रभाव इन शक्ति केन्द्रों पर पडता है। जिससे कि ये केन्द्र (जिनमें विभिन्न प्रकार की शक्तियां समाहित रहती हैं)सुप्तावस्था से जागृ्त अवस्था में आ जाते हैं।

यूं तो इन उपत्यकाओं के अन्दर भी छोटे छोटे षष्ट चक्रों में असंख्य शक्ति संस्थान होते हैं,जिन्हे कि सिर्फ मंत्र ध्वनि के माध्यम से जागृ्त नहीं किया जा सकता। इन्हे जागृ्त करने के लिए आकाश तत्व की आवश्यकता होती है,जिसके लिए हवन क्रिया का हमारे ऋषि मुनियों नें निर्धारण किया है। कभी समय मिला तो इसके बारें में  एक लेख के माध्यम से विस्तार से समझाने का प्रयास करूंगा।

 आज अगर हम विज्ञान के आवरण से बाहर निकलकर देखें तो पाएंगे कि वेद,पुराण और शास्त्रों के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का असीमित भंडार भरा पड़ा है। वैसे भी हमारी बुद्धि जिस तथ्य के रहस्य को समझ पाती है उसे विज्ञान की संज्ञा दी जाती है तथा जिस तथ्य को भेदने में हमारी बुद्धि सक्षम नही होती उसे अज्ञान और अंधविश्वास मान लिया जाता है।