मंत्र शक्ति का वैज्ञानिक विश्लेषण

मंत्र एक वैज्ञानिक विचारधारा है, एक सत्य है, जिसमे  कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है तथा न ही यह रूढिवादिता है। अपितु मंत्र विज्ञान विशुद्ध वैज्ञानिक सिद्धांतो पर आधारित है। यह् धन दे कर खरीदी जा सकने वाली वस्तु नहीं है। क्यों कि यह तो एक सिद्धि है,सूक्ष्म वैज्ञानिक विचारधारा है, सचेतन शास्त्र है। इसमे न तो आधुनिक मशीनरी सी जटिलता है और न ही अधिभौतिकता,अपितु यह तो एक गहन तकनीक है जिसको समझने के लिए आस्था और संयम बनाए रखकर आध्यात्मिक सागर में उतरना होता है।
आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों के अनुसार मंत्र शक्ति मुख्यत: शब्दों की ध्वनि और लय पर आधारित  है।
शब्दों की ध्वनि और लय :- मंत्रों मे ध्वनि और लय का विशेष महत्व है। जो व्यक्ति एक निश्चित लय के साथ मंत्र का उच्चारण करता है, वह उस मंत्र की शक्ति से अवश्य लाभान्वित होता है। लेकिन एक सीधे रूप में उस मंत्र का मात्र पठन कर लिया जाए तो उसका प्रभाव नहीं होगा,क्यों कि उस शब्द और वाक्य के साथ लय का संयोग नहीं है।
किसी शब्द की मूल ध्वनि वह है जिससे उसका निश्चित प्रभाव पड सके। मंत्रों में शब्द अथवा उसका अर्थ अपने आप में अधिक महत्व नहीं रखते,अपितु उसकी ध्वनि विशेष महत्वपूर्ण है।
आंतरिक विधुत धारा विज्ञान के अनुसार जिस भी शब्द का उच्चारण हम लोग करते हैं,वह इस ब्राह्मंड में तैरने लगता है। उदाहरण के लिए एक रेडियो स्टेशन पर किसी भी गीत की पंक्ति का अंश बोला जाता है तो वह उसी समय वायुमंडल में फैल जाता है। तथा विश्व के किसी भी देश,किसी भी कोने में श्रोता यदि चाहे तो उसके रेडियो के माध्यम से उस गीत की पंक्ति का अंश सुन सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि रेडियो में सूई उसी फ्रीक्वैंसी पर लगाने की जानकारी हो। इस प्रकार ग्राहक और ग्राह्य का आपस में पूर्ण संपर्क आवश्यक है, उसी प्रकार मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तो मंत्र उच्चारण से भी एक विशिष्ट ध्वनि कंपन बनता है जो कि संपूर्ण वायु मंडल में व्याप्त हो जाता है। इसके साथ ही आंतरिक विधुत भी तरंगों में निहित रहती है। यह आंतरिक विधुत, जो शब्द उच्चारण से उत्पन्न तरंगों में निहित रहती है, शब्द की लहरों को व्यक्ति विशेष या संबंधित देवता,ग्रह की दिशा विशेष की ओर भेजती है।
अब प्रश्न यह उठता है कि यह आन्तरिक विधुत किस प्रकार उत्पन्न होती है? यह बात वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मान ली गई है कि ध्यान,मनन,चिन्तन आदि करते समय जब व्यक्ति एकाग्र चित्त होता है,उस अवस्था में रसायनिक क्रियायों के फलस्वरूप शरीर में विधुत जैसी एक धारा प्रवाहित होती है(आंतरिक विधुत) तथा मस्तिष्क से विशेष प्रकार का विकिरण उत्पन्न होता है। इसे आप मानसिक विधुत कह सकते हैं। यही मानसिक विधुत (अल्फा तरंगें) मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर,दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करती है या इच्छित कार्य संपादन में सहायक सिद्ध होती है। यह मानसिक विधुत(उर्जा)भूयोजित न हो जाए,इसीलिए मंत्र जाप करते समय भूमी पर कंबल,चटाई,कुशा इत्यादि के आसन का उपयोग किया जाता है।
मानव की भौतिक इच्छाओं की लालसा से प्रेरित होकर हमारे आर्य ऋषियों नें, ध्वनि समायोजन कर के, भाषा को मंत्रों का स्वरूप प्रदान किया था, जिसे कि आज हम रूढिवादिता मान बैठे हैं।