शकुन अपशकुन विचार

विज्ञान का युग जो तीव्रता से ग्रह नक्ष्त्रों को पार कर रहा है।  ऎसे समय शकुन की बात प्राय: हास्यप्रद समझी जाती है। आज जीवन इतनी तेजी से दौड रहा है कि शकुन का विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता यह सत्य है, परन्तु शकुन तो प्रस्तुत होते रहते हैं और संभवत: आगे भी घटित होते रहेंगे।
इसमे कोई अतिश्योक्ति नहीं कि जीवन बहुत व्यस्त है और स्वयं के विषय में भी सोचने का अवसर प्राय: नहीं मिल पाता तो ऎसे में शुभ और अशुभ क्या? इस आधुनिक युग में शकुन-अपशकुन विचार, इस विषय में बात करना भी शायद पिछडेपन का सूचक समझा जाए। इस पर भी आज की व्यस्त जिन्दगी,आज का उन्नत विज्ञान पूर्णरूपेण एक शकुन के शुभ होने पर ही टिकता है और शकुन अशुभ हो तो ध्वस्त भी होता है। और प्रत्येक कार्य के प्रारम्भ में शकुन घटित होता ही है। इसे हम बेशक मानें या न मानें।
अक्सर देखने में आता है कि बच्चा जब परीक्षा देने जाए या कोई व्यक्ति नौकरी हेतु इन्टरव्यू वगैरह देने के लिए निकले अथवा घर का कोई सदस्य किसी यात्रा के लिए प्रस्थान करे तो  उसे एक चम्मच मीठा दही खिला कर विदा करना शुभ माना जाता है।
घर से निकलते ही किसी चीज से वस्त्र उलझ जाए या पांव किसी वस्तु से टकरा जाए अथवा पीछे से कोई पुकार ले........ये सब बातें क्या हैं? ये सब बातें हैं या इनका कोई अर्थ भी है?जी हां! इन सबका अर्थ है और यह अर्थ धरातल की वह ठोस सच्चाई है, जिसे आप मानें या न मानें परन्तु शकुन घटित अवश्य होते है।

यहां मै यह स्पष्ट करना चाहूंगा कि शकुन बनाए नहीं जाते बल्कि ये तो प्रकृति द्वारा स्वयं ही निर्मित होते हैं। आज भी गांव देहात में किसान चींटियों के झुण्ड को देखकर मौसम का अनुमान लगा लेते हैं और यह अनुमान शत प्रतिशत सत्य ही प्रमाणित होता है। आज जब कि मौसम विज्ञान अरबों रूपये व्यय करके भी मौसम की शत प्रतिशत सत्य भविष्यवाणी नहीं कर पाता तो एक चिडिया धूल को अपने ऊपर उछाल उछाल करके भारी वर्षा का संकेत दे देती है।

हमारे यहां ब्राह्मण, बनिये, खत्री इत्यादि परिवारों में आज भी घर से कन्या के विदा होने के बाद, घर वाले अपने घर के किसी सदस्य को उस दिन सिर नहीं धोने देते। दामाद के विदा होने के बाद उस दिन घर में झाडू नहीं लगाई जाती-यह सब क्यों? क्या यह सब पिछडापन है? सम्भवत: एक वर्ग स्वीकार करेगा कि यह तो फालतू दकियानूसी बातें है----परन्तु विश्वास कीजिए कि वाकई में ये अशुभ होता है।

आदिकाल से ही मनुष्य का विश्वास शकुन को मानता आ रहा है। यधपि आजकल के सभ्य कहलाने वाले लोग इसे मूर्खता या अंधविश्वास भी कहते हैं। इस पर भी उन्ही को कभी कभी कहते सुना जाता है कि यार आज बाईं आंख फडक रही है-- यह बात कह कर दबे स्वर में क्या वह शकुन की बात नहीं कहते? आंख फडकना क्या है? व्यापारी, व्यापार के प्रारम्भ में उधार सामान नहीं देते- यह क्या है? बिल्ली रास्ता काटे,चलते समय पीछे से कोई छींक दे -यह क्या है? यह शकुन है-शकुन!

अब न मानने वाले तो प्रभु की सत्ता भी स्वीकार नहीं करते तब वह शकुन को क्या मानेंगे? अब अगर किसी को कहा जाए कि घर से निकलते समय यदि पीछे से कोई छींक दे या फिर बिल्ली रास्ता काट दे तो उस समय यात्रा नहीं करनी चाहिए। उन्हे यह कहने में कोई आपति नहीं होगी कि यदि नाक है तो छींक आयेगी ही और बिल्ली चलने फिरने वाला पशु है, वो तो सडक से गुजरेगी ही। इन बातों के उत्तर में यही कहना है कि न मानने से ईश्वर का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। विश्वास एवं श्रद्धा से ही उसे समझा जा सकता है,अनुभव किया जा सकता है। इसी भांती न मानने से भी शकुन का फल तो घटित होने से रूकेगा नहीं। शकुन के उपस्थित होने का तात्पर्य है कि कुछ न कुछ फल घटित होगा ही। यह तो वही बात है कि गाडी स्टेशन पर खडी है और छूटेगी तो अगले स्टेशन पर पहुंचेगी भी। बेशक आप यह सोचते रहें कि गाडी अगले स्टेशन पर नहीं पहुंचेगी। हमारे सोचने से क्या होता है? गाडी छूटेगी तो मंजिल पर जायेगी ही। हमारा तर्क आधारभूत तब होता जब हम कहते कि गाडी का छूटना ही उसका मंजिल तक पहुंचने का प्रमाण है। इसी भांती शकुन मिलने पर उसके फल की प्राप्ति रूकती नहीं, बेशक हम उसे माने अथवा न मानें।