शास्त्रों को समझने के लिए आधुनिकता की सोच से बाहर निकलकर देखना होगा

अगर देखा जाए तो इस संसार के कण-कण में ज्ञान भरा पड़ा है। हमारी बुद्धि जिस तथ्य के रहस्य को समझ पाती है उसे विज्ञान की संज्ञा दी जाती है तथा जिस तथ्य को भेदने में हमारी बुद्धि सक्षम नही होती उसे अज्ञान और अंधविश्वास का नाम दे दिया जाता है। खैर यह विज्ञान एवं अंधविश्वास( अज्ञान) का विषय बहुत गहरा है, और इसे चंद पंक्तियो या फिर एक लेख के माध्यम से व्यक्त  करना लगभग असंभव कार्य है।
अपने पिछले लेख ग्रह निर्धारित करते हैं आपका व्यक्तित्व का दूसरा भाग आज जब मैं पोस्ट करने लगा तो मुझे पुरानी पोस्ट के अन्त में इस संदेश के लिए एक लिन्क दिखाई दिया.जब उत्सुकतावश उस लिंक को खोला तो देखा कि एक स्वनामधन्य सज्जन ने अपने ब्लाग पर मेरे इस लेख का लिंक दिया हुआ है, जिसमे वो भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान को फूहड  सिद्ध करने के बडे भारी पुण्य कार्य में जी जान से लगे हुए हैं। उनके लिखे को पढने के बाद मैं जहाँ तक उनकी बात को समझ पाया हूँ, उससे यह प्रतीत होता है कि वैदिक साहित्य, पुराण, उपनिषद, शास्त्र, ज्योतिष इत्यादि उनकी दृ्ष्टि में मात्र एक अन्धविश्वाश (अज्ञान) से बढकर कुछ नहीं।.खैर इसमे.कोई आश्चर्य की बात नहीं,उन्ही की भांती बहुत से नवचिन्तक भी इसे इसी श्रेणी में देखते हैं,जिनकी  ज्ञानमीमांसा में ज्ञान ज्ञान नहीं है,बल्कि परले दरजे का अज्ञान है।
इस आधुनिक काल में ये सचमुच बहुत दुर्भाग्यपूर्ण् स्थिति है कि चन्द नवचिंतकों के कृत्यों के फलस्वरूप जाने कितने लोग जो स्वयं वेद,शास्त्र,पुराण,उपनिषद  इत्यादि धरोहरों से उत्पन्न ज्ञान तक पहुंचने का कष्ट नहीं उठाते या कहें कि पहुंच नहीं पाते।वे लोग इनके बताए वचनों/कुतर्कों को परम सत्य मान कर इनके साथ साथ स्वयं को भी आधुनिक अनुभव करने लगते हैं।
ज्योतिष शास्त्र जो कि सदियों से न जाने कितने संप्रदायों, विचारधाराओं और दर्शनों से टकराकर आज तक प्रवहमान रहा है,और जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है।,जो वेदों का भी चक्षु हो अर्थात् वेदों को समझने के लिए जिसका आश्रय लेना पड़े ऐसा ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक के जीवन में संजीवनी का कार्य कर सकता है। किन्तु ये बेहद ही दुर्भाग्यपूर्ण  है कि हम लोग हैं कि अपनी अल्पज्ञता के कारण इसे उपहास का विषय मान बैठे हैं।
यहां मैं मसिजीवी जी से सिर्फ केवल  एक बात कहना चाहूंगा कि किसी विषय वस्तु की जानकारी का अभाव होने पर उसके अस्तित्व से इन्कार करना ही पर्याप्त नहीं है। अगर आप सिर्फ एक बार अपने दुराग्रहों का परित्याग करके विचारों कि गहराइयों में जब गोता लगाएंगे  तो यह तर्क  आपके मन मस्तिष्क को अवश्य आंदोलित करेगा  कि कहीं ऐसा तो नही कि हम या हमारा आधुनिक पंगु विज्ञान शास्त्रों के रहस्य को भेदने में आज सक्षम नहीं, इसीलिए हम इसे महज एक अन्धविश्वाश (अज्ञान) के रूप में परिभाषित कर रहें हैं? जैसे ही यह विचार मन में आया नहीं कि समझिए आपके मन कि सारी भ्रांतिया स्वत: ही दूर हो जाएगीं।


पौराणिक शास्त्रों को समझने और उसके लाभ को प्राप्त करने के लिए हमें आधुनिकता की सोच से बाहर निकलकर विस्तृत समझ के साथ इन्हे पढना सीखना होगा। इस परिपक्व दृ्ष्टिकोण के साथ शास्त्रज्ञान और  विज्ञान में फिर विरोधाभास नहीं होगा अपितु दोनो एक दूसरे के पूरक ही दिखाई देंगे।