ग्रह निर्धारित करते हैं आपका व्यक्तित्व (भाग 3)

 पिछले दो लेखों भाग 1 और भाग 2 के माध्यम से आपने यह जाना कि मानव मस्तिष्क जो कि ज्योतिष अनुसार 42 विभिन्न केन्द्रों मे विभाजित है, जिन के द्वारा मनुष्य के अन्दर विभिन्न प्रकार के गुण-दोषों का विकास होता है। अब इस पोस्ट के जरिए ये समझने की चेष्टा करते हैं कि जन्मकुंडली में किस प्रकार विभिन्न ग्रह अपनी स्थिति के द्वारा इन केन्द्रों को स्पंदित करके, मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं ।

1. अगर सप्तमेश स्वगृही होकर सप्तम स्थान में ही बैठा हो अथवा तीसरे भाव का स्वामी इस स्थान में स्थित हो तो वह मन में तीव्र अभिलाषाओं की उत्पत्ति का कारण बनता है। ऎसे व्यक्ति के मन मस्तिष्क में असीम ईच्छाएं निरन्तर जन्म लेती रहती हैं। अनुभव सिद्ध है कि चपटे सिर वाले जातक की अभिलाषाएं अधिक होती हैं और तंग सिर वाले की कम।

2. यदि कुंडली में पांचवें भाव का स्वामी अष्टम स्थान में स्थित हो तो वह मस्तिष्क के अष्ट्म भाग को स्पंदित करते हुए प्रभावित करता है। जिससे जातक के अन्दर दृ्ड निश्चयी प्रवृति का प्रादुर्भाव होता है। ऎसे व्यक्तियों में भीषण से भीषण मुसीबत से लडकर सुरक्षित निकल जाने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।

3. दशमेश अगर नवम भाव में स्थित हो तो जातक के अन्दर प्रतिशोध प्रवृति का प्रादुर्भाव होता है। ऎसे व्यक्तियों के मन में बदला लेने की भावना प्रबल हो जाती है। यदि जातक अपने जीते जी अनिष्टकर्ता से बदला नहीं ले पाता तो वह अपनी संतान से कह जाता है कि पिता के शत्रु से बदला अवश्य ले।

4. तृतीयेश अगर स्वगृही होकर तीसरे भाव में ही स्थित हो तो वह मस्तिष्क के दशम भाग को स्पंदित करके स्वाद इन्द्रियों को जागृत करता है। ऎसे व्यक्तियों में अनुभव करने की तीव्र शक्ति तथा उसकी पाचन शक्ति काफी प्रबल होती है।

5. अगर दशमेश स्वगृही दशम भाव में बैठा हो तो जातक में दूरदर्शिता की प्रवृति उत्पन्न होती है। ऎसा व्यक्ति भविष्य का हित सोचकर समय से पूर्व ही कार्य सम्पन्न कर लेता है, वह भाग्य के भरोसे नहीं बैठा रह सकता।

6. यदि द्वादशेश अर्थात बाहरवें भाव का स्वामी कुंडली के छठे भाव में स्थित हो तो वह मस्तिष्क के 18वें,23वें तथा 30वें भाग को स्पंदित करता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति के अन्दर आशा-विश्वास, सौन्दर्य प्रेम, एवं संतुलन रखने की शक्ति का प्रादुर्भाव होता है।18वें केन्द्र के कारण उसमें आशा विश्वास की प्रबलता,23वें केन्द्र के कारण सौन्दर्य प्रेम की प्रवृ्ति उत्पन्न होती है। ऎसे व्यक्ति की दृ्ष्टि में अपना रूप रंग,पोशाक,पत्नि सब कुछ सुन्दर होना चाहिए, गुण हों चाहे न हों, केवल सुन्दरता होनी चाहिए। तथा 30वें केन्द्र से संतुलन शक्ति के कारण 'यथा देव तथा पूजा' जैसी प्रवृति अर्थात उसमें तालमेल बिठाने की शक्ति गजब की होती है।

7. चतुर्थेश अगर स्वगृही है तो वो मस्तिष्क के 4थे (मैत्री भाग), 21वें (दया-सहानुभूति भाग) 28वें (स्मृति भाग) तथा 40वें (तुलनात्मक शक्ति) के केन्द्रों को संचालित करता है। फलस्वरूप व्यक्ति अपने मित्रों के दोषों को छुपाने तथा गुणों को उजागर करने में कुशल होता है।यदि उसकी पेशानी ज्यादा चौडी एवं कम ऊंची हो तो सहानुभूति मध्यम श्रेणी की ,अगर पेशानी तंग हो तो सहानुभूति थोडी कम होती है, किन्तु होती अवश्य है। ऎसे व्यक्तियों में पुरानी स्मृतियों को संजोकर रखने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है,साथ ही ऎसा व्यक्ति तुलनात्मक अध्य्यन द्वारा तथ्यों को समझने में भी पूर्ण रूप से निपुण होता है।

 8. दशमेश यदि अष्ट्म भाव में हो तो व्यक्ति जातक में कपटाचरण की प्रबृति बहुत बढ जाती है। जातक प्रत्येक वस्तु को साफ-सुथरी और व्यवस्थित रूप से रखने में चिश्वास रखता है, किन्तु वास्तव में वह भेड की खाल में भेडिया ही होता है।

9. दशमेश यदि तीसरे भाव में हो तो वह मस्तिष्क के 12वें तथा 36वें केन्द्र को सपंदित करता है। जिससे जातक में गोपनीयता तथा कालगति का की प्रवृ्ति उत्पन्न होती है। वह प्रत्येक कार्य चालाकी से करना,अपना भेद छुपाए रखना तथा जब तक अपने विचारों को प्रकट करने का उचित्त अवसर न आए,तब तक छुपाए रखता है।

10.पंचमेश के स्वगृही होने से मस्तिष्क के 20वें (बडप्पन), 29वें (व्यवहारिकता एवं तदबीर) तथा 41वें केन्द्र (मानवीय गुण) स्पंदित होते हैं। ऎसा व्यक्ति अपनी जाति/कुल/परम्परा/स्थान/देश इत्यादि के प्रति बडप्पन की भावना लेकर जीता है। उसे 24 से 29 वर्ष की आयु मध्य अपने जीवनकाल में चिडियों के हाथों बाज को मरवा देने वाली तदबीर का कमाल देखने को मिलता है। ऎसा व्यक्ति चाहे ऊपर से कितना भी कठोर दिखाई दे,किन्तु उसके हृ्दय में मानवीय गुणों का निरन्तर प्रवाह बना रहता है।

11.भाग्येश (नवम भाव का स्वामी) एकादश भाव में स्थित होकर मस्तिष्क के 35वें केन्द्र को स्पंदित करता है। जिस कारण जातक में घटनाओं में रूचि लेने की प्रवृति जागृत होती है। अक्सर देखा गया है कि इतिहास अथवा राजनीति ऎसे व्यक्तियों का प्रिय विषय होता है।

इतना सब पढने के बाद बहुत से पाठकों के मन मे यही प्रश्न होगा कि हमें तो ये मालूम ही नहीं है कि हमारी जन्मकुंड्ली में कौन सा ग्रह मस्तिष्क के किस केन्द्र को प्रभावित कर रहा हैं,ये सारी जानकारी तो केवल ज्योतिष के जानकार लोगों के लिए हैं 

अतैव जिन पाठकों को ज्योतिष विधा की सामान्य जानकारी भी नहीं हैं, किन्तु मन में इस विषय को समझने अथवा अपने बारे में जानने की जिज्ञासा रखते हैं, वो लोग अपना जन्मविवरण टिप्पणी अथवा मेल के जरिए भेजकर अपनी ग्रह स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं उसके पश्चात आप स्वयं अनुभव करेंगे कि यहां इन लेखों के माध्यम से आपके सामने जो सामग्री प्रस्तुत की जा रही है, वो कोई कपोल कल्पित बातें अथवा केवल किताबी ज्ञान नहीं अपितु पूर्णत: अनुभव सिद्ध हैं

इस वैबसाईट पर आकर अपना कीमती समय प्रदान करने हेतु आपका अग्रिम धन्यवाद...........