ज्योतिष बिकता है!

वैदिक काल की भाँति ही वर्तमान युग में भी ज्योतिष की महत्ता पूर्णत: बरकरार है, बल्कि यदि यह कहा जाये कि आज के समय ज्योतिष अधिक प्रासांगिक है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. संसार पर सदा से ही चतुर व्यक्तियों ने राज किया है. चूंकि ज्योतिष आज बिकता है तो ऎसे अनाधिकृत व्यक्तियों (श्रद्धाविहीन) ने इसका व्यावसायिक दोहन शुरु कर दिया है. जिनका ज्योतिष शास्त्र में तनिक भी विश्वास नहीं.

आजकल आप टी.वी. के भिन्न-भिन्न चैनलो पर ज्योतिष सम्बन्धी सामग्री की बिक्री के बारे में देख-सुन सकते हैं कि इस विशेष यन्त्र या माला को खरीदने/धारण करने से आपको विशेष लाभ होगा तथा इस विशेष वस्तु को अपने पास रखने से आपको कष्टो से मुक्ति मिलेगी. किसी भी साधन में शक्ति, साधना के तप-बल की होती है. मन्त्रो में शक्ति होती है, इस बात पर सन्देह करने का कोई कारण ही नहीं परन्तु यहाँ पर विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि जो विद्वान किसी धातु के यन्त्र को सिद्ध करने का दावा करते हैं क्या वे तपस्वी, श्रद्धावान, ज्ञानी एंव आध्यात्मिक उर्जा से परिपूर्ण है या फिर केवल अर्थ लाभ के लिए सरल एंव पीडित व्यक्तियों की भावनाओं का शोषण करते हैं. किसी विषय का ज्ञान होना एक अलग बात है और उस ज्ञान को सत्यता की कसौटी पर परखना दूसरी बात है. साधना में ज्ञान के साथ-साथ क्रिया पर जोर दिया जाता है.

साधना में एक ओर बात जो महत्वपूर्ण होती है, वह है तन, मन एंव बुद्धि की पवित्रता जोकि स्वंय को कष्ट देकर(तप द्वारा) ही प्राप्त की जा सकती है.

अतः हमें टी.वी. चैनलो पर दिखलाये जाने वाले झूठे व भ्रामक प्रचार से बचना चाहिये अन्यथा कुछ व्यवसायी एंव धोखेबाज ज्योतिषियो के कारण ज्योतिष विद्या पर आँच आ सकती है तथा लोगो का विश्वास इस पर से उठ सकता है.

वास्तव मे ज्योतिष के दो विभाग है एक गणित एव दूसरा फलित. गणित के विषय में पारंगता प्राप्त करने के लिए व्यक्ति बिशेष का मात्र बौद्धिक स्तर अच्छा होना चाहिये. नैतिक एंव आध्यात्मिक गुणों का होना आवश्यक नहीं. आजकल एसे बहुत से माडर्न ज्योतिषी है जो एक हाथ में सिगरेट व दूसरे हाथ में ज्योतिष की किताब लेकर अध्ययन करते हैं. इनमें से कुछ महानुभाव तो मांस-मदिरा तक का सेवन करते है, अब ऎसे धुरन्धरो से फलादेश की उम्मीद करना तो नितांत बेमानी होगा.
गणित को तो कोई भी सीख सकता है, लेकिन अगर आप फलित को जानना चाहते है तो बिना नीति,तप
आध्यात्मिकता एवं ईश कृपा के तो इसकी प्राप्ति पूर्णत: असभंव है.