पुनरपि जननं ,पुनरपि मरणं

संसार का कोई भी मनुष्य बिना कर्म के नही रह सकता. कहावत भी है कि सकल पदार्थ है जग माही,कर्म हीन नर पावत नाहीं,जो कर्म नही करता है,उसे कुछ् भी नही मिल पाता है.वही व्यक्ति श्रेष्ठ होता है जो इन्द्रियों को वश मे रख कर अनासक्त भाव से कर्म करता है । जिस किसी ने जो किया है उसका फल उसको मिलेगा ही....यही सत्य है. कर्म फल के रूप मे हर जीव को जो किया है उसका भुगतान तो उसे देना ही पडेगा. अगर कोई व्यक्ति किसी कारण वश किये गये कर्म को अपने जीवन काल मे भोग नही पाया तो उसके बच्चों को वह किया गया कर्म भोगना पडेगा. बाप ने अगर पाप किया है तो पुत्र को उसका फल भोगना पडेगा राजा.दशरथ ने श्रवण को मारा था, लेकिन श्रीराम को उसका फल भोगना पडा था. श्रीराम ने तो कोई पाप नही किया था,मगर "दशरथ मरण,सिया को हरण,वन में विपति परी,कर्म गति टारे नाहिं टरी".यह कर्म गति राजा दशरथ ने की थी,और कर्म फल श्री राम को भोगना पडा था.जब तक कर्म फल् पूरे नही होते तब तक इस जीवात्मा को पॄथ्वी पर बारबार जन्म लेना पडेगा और अन्तत: अपने कर्म फल को पूर्ण करना पडेगा. 
इस बात को भदावरी-ज्योतिष मे बॄहस्पति ग्रह के माध्यम से व्यक्त किया जाता है. जन्म के समय व्यक्ति की जन्मकुंडली में स्थित बॄहस्पति को देख कर पता लगाया जाता है कि उसके कौन से कर्म शेष थे जिन्हे पूर्ण करने के लिये जातक पृथ्वी पर वापस जन्म लेकर आया है और यही बॄहस्पति बताता है कितनी समयवधि के लिये उसका आगमन हुआ है और आयु की कितनी अवधि पश्चात वह पुन: जन्म लेने के लिये मॄत्यु को प्राप्त कर लेगा ।

पुरुष की जीवात्मा का विवेचन बॄहस्पति से किया जाता है और स्त्री की जीवात्मा का विवेचन शुक्र ग्रह से किया जाता है. जीवात्मा जन्मकुंडली के किस भाव मे है उसके अनुसार ही पता लगाया जाता है कि उससे दसवें भाव में कौन सा घर है और जो घर है उसका स्वामी जीवात्मा की पकड मे है या नही है. यदि पकड मे है तो जीवात्मा इस जन्म में कार्य को पूरा कर लेगी और यदि स्वामी ग्रह पकड मे नही है तो जीवात्मा उस कर्म को सामयिक करेगी और बाकी समय मे व्यर्थ रहेगी. उस फ़ालतू समय मे वह उन कर्मों को अन्जाम देगी,जिनसे उसके कर्म फलों का इजाफ़ा होता रहेगा.
कर्म फलों का इजाफ़ा नहीं हो,इसीलिए संत पुरुषों ने इन्सान को ध्यान-समाधि, तप आदि का आश्रय लेने के लिये कहा है.केवलमात्र ध्यान-समाधि ही एक ऎसा साधन है, जिसके द्वारा अपने कर्म फलों को बढने से रोका जा सकता है अन्यथा हमारे कर्म क्षण-प्रतिक्षण बढते रहेंगें और अनादिकाल तक पुनरर्पि जन्मं--पुनरर्पि मरणं चलता रहेगा.