ज्योतिष--यथार्थ या अंधविश्वास

अक्सर देखने में आता है कि आध्यात्मिक क्षेत्र से जुडे हुए अधिकतर सन्त ज्योतिष विद्या के प्रति एक नकारात्मक दृष्टिकोण रखते हैं. आश्चर्य तो इस बात से होता है कि उन सन्त-महपुरुषो की वेद-पुराणो में पूर्ण आस्था एंव विश्वास होता है परन्तु वेदो के नेत्र माने जाने वाले ज्योतिष का वे लोग अपनी बुद्धि के अनुसार खण्डन करने लगते हैं. इसके पीछे कौन सा कारण है यह विचारणीय एंव खोज का विषय है. अपने जीवन में हमारा ऎसे कई सन्तो से सामना हुआ है जिनका कहना है कि जो कुछ भी है सब परमात्मा है, ज्योतिष वगैरह सब बकवास है तथा इस मन्त्र का जप करो सब ठीक हो जायेगा.
समाज में एक लोकोक्ति बहुत प्रचलित है कि "नीम-हकीम खतरा ए-जान". संसार में जड-चेतन जो कुछ भी है उसका अपना एक अर्थ तथा प्रभाव है, लेकिन उसका लाभ किस प्रकार से लिया जा सकता है, इसे कोई विरला ही जान पाता है. परमात्मा का स्थान जीवन में सर्वोच्च है, इसमें शक करने का कोई कारण नहीं, परन्तु जो एक बात हम अक्सर भूल जाते हैं वो यह है कि परमात्मा हम सबका स्वामी है सेवक नहीं. संसार में जो कुछ भी घटित होता है वह परमात्मा कि इच्छा से होता है, लेकिन परमात्मा अपनी इच्छा विशेष सेवको को उत्पन्न करके उनके माध्यम से पूरी करता है. गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है फल देने का अधिकार केवल परमात्मा के हाथों में है. ज्योतिष शास्त्र एक ऎसा दर्पण है जिसमें मनुष्य अपने कर्मो के फल को देख सकता है. तथा अपने किए गये कर्मानुरूप सूर्य-चन्द्रादि नवग्रहो के माध्यम से केवल उन कर्मो का अच्छा या बुरा फल भोगता है.
ज्योतिष विद्या की सत्यता इस बात से प्रमाणित हो जाती है कि मनुष्य द्वारा लाख इच्छा-प्रयत्न करने के बावजूद उसके जीवन में अप्रत्याशित रुप से अविश्वसनीय घटनाऎं घटित होती हैं. यदि हम सिद्धान्तो की बात करें तो किसी भी कार्य का परिणाम नियम के अनुरुप होना चाहिये. परन्तु हमारी सोच एंव सिद्धान्तो के विपरीत दृष्टिगोचर होने वाली आश्चर्यजनक घटनाऎं ही अपने आप में ज्योतिष के अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए काफी हैं.
प्रत्येक मनुष्य का कुछ न कुछ सपना होता है और वह अपने सपनों को यथार्थ में बदलने के लिये युक्ति एंव शक्ति का पूर्ण उपयोग करता है. इसके बावजूद स्तब्ध कर देने वाला परिणाम सामने आता है. आखिर क्यों ? क्योकि हमारे अस्तित्व से अलग हम पर नियन्त्रण करने वाली शक्तियाँ ग्रहो एंव देवो (देवी- देवताओं) के रुप में सृष्टि में मौजूद है एंव परमात्मा के संकल्पो को पूर्ण करने का उत्तरदायित्व इन्ही शक्तियो के जिम्मे होता है.
जिज्ञासा की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण प्रश्न उभरकर सामने आता है कि ज्योतिष और अध्यात्म में घनिष्ठ या निकटवर्ती सम्बन्ध होने के बावजूद भी एक दूसरे से भिन्न परिणाम क्यों हैं. इसका कारण यह है कि ज्योतिष के माध्यम से हम अपने इस लोक को सुधार सकते हैं अर्थात जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति और कष्टो से निवृत्ति पा सकते हैं. जबकि अध्यात्म से परलोक सुधरता है तथा परमात्मा की कृपा एंव मुक्ति की प्राप्ति होती है. वेदों में (विशेषकर यजुर्वेद ) कर्मकाण्ड के अन्तर्गत सकाम फल प्राप्ति के लिए बहुत से मन्त्र दिये गए हैं जो कि यज्ञ के दौरान आहुति में प्रयुक्त किये जाते हैं. इस सबसे यह सिद्ध होता है कि ज्योतिष शास्त्र कोई अन्धविश्वास नहीं बल्कि यथार्थ है.