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क्या राईट बन्धुओं से पहले ही भारत में विमान का आविष्कार हो चुका था ?

>> Monday 28 December 2009

हिन्दू धर्म से संबंधित विभिन्न धार्मिक कथा कहानियों में इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं कि प्राचीन काल में विभिन्न देवी-देवता,यक्ष,गंधर्व,ऋषि-मुनि इत्यादि विभिन्न प्रकार के विमानों द्वारा यात्रा भ्रमण किया करते थे। जैसे कि रामायण में पुष्पक विमान का वर्णन आता है। महाभारत में भी श्री कृष्ण, जरासंध आदि के विमानों का वर्णन आता है। इसी प्रकार से श्रीमहाभागवत में कर्दम ऋषि की एक कथा आती है कि तपस्या में तल्लीनता के कारण वे अपनी पत्नी की ओर अधिक ध्यान नहीं दे पाते थे। किन्तु कुछ समय बाद जब उन्हे इसका भान हुआ तो उन्होंने अपने विमान के द्वारा उसे संपूर्ण विश्व का भ्रमण कराया। 

देखा जाए तो इन उपरोक्त वर्णित कथाओं को जब आज का तार्किक व प्रयोगशील व्यक्ति सुनता,पढ़ता है तो उसके मन में स्वाभाविक रूप से ये विचार आता है कि यें सब कपोल कल्पनाएं हैं, मानव के मनोंरंजन हेतु गढ़ी गई कहानियॉ मात्र है। ऐसा विचार आना सहज व स्वाभाविक है, क्योंकि आज देश में इस प्रकार के कहीं कोई प्राचीन अवशेष नहीं मिलते, जों ये सिद्ध कर सकें कि प्राचीनकाल में मनुष्य विमान निर्माण की तकनीक से परिचित था। किन्तु यदि भारतीय ग्रन्थों का सही तरीके से अध्ययन, मनन करें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि युद्ध कौशल में प्रयोग होने वाले विभिन्न प्रक्षेपात्रों, अदृ्श्य अस्त्रों-शस्त्रों आदि की उपलब्धता भारत में विज्ञान के चर्मोत्कर्ष की ओर संकेत करती है। इसी क्रम में प्राचीन भारतीय विमान शास्त्र पर आज ये लेख प्रस्तुत कर रहा हूँ जिससे कि आप लोगों को प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की एक झलकी मिल सके।  
मैं यह दृ्डतापूर्वक कह सकता हूँ कि विभिन्न वैज्ञानिक निर्माण, आविष्कार आदि जितनी भी लोकोपयोगी विद्याएं हैं---ये सभी भारत की ही देन हैं। समुद्रतल तथा आकाशमंडल की परिधि में उडना, विभिन्न लोकों में गमन, विशाल भवन,यान, वाहन आदि का बनाना इत्यादि सम्पूर्ण यान्त्रिक संस्कृ्ति, आविष्कारों, खोजों की आदि विकासस्थली हमारी यह भारतभूमी ही है। व्यास,वशिष्ठ,विश्वामित्र,पाराशर, याज्ञवल्क्य, जैमिनी, अत्रि, वत्स, नारद, भारद्वाज, शकटायन, स्फोटायन, प्रभूति इत्यादि मन्त्रदृ्ष्टा ऋषि ही यन्त्रों के भी आविष्कारक तथा निर्माता रहे हैं । महर्षि अत्रि और वत्स तो अपने समय के तत्वान्वेषी वैज्ञानिक मनीषी थे तथा सर्वप्रथम इन्ही दो मनीषियों नें चन्द्र सूर्य ग्रहण विज्ञान और आकर्षण विज्ञान का पता लगाया था। जिसका विशद विवेचन यहाँ तो असंभव है। खेद है कि आज अपने इस गौरवपूर्ण अध्यायों से हम अपरिचित होकर उक्त तथ्यों के आविष्कार का श्रेय पश्चिमी जगत को देते हैं।  ओर जो थोडे बहुत कुछ बहुत लोग इन तथ्यों से परिचित हैं भी, वो भी अपनी अकर्मण्यता से इन अमूल्य तथ्यों को विश्व के प्रबुद्ध समाज के सामने लाने का कोई प्रयास नहीं करते।  लेकिन अगर कोई भला आदमी प्रयास करता भी है तो ये हिन्दूस्तान में बैठे पश्चिमबुद्धि काले अंग्रेज जो बैठे हैं, बिना जाने समझे इन तथ्यों को नकारने में। सबसे पहले तो इन तथाकथित विज्ञानबुद्धियों से ही निपटने में बेचारे का हौंसला पस्त हो चुका होता है--- शेष दुनिया को कोई क्या खाक समझाएगा।
यह निर्विवाद तथ्य है कि प्राचीन भारतीय ऋषि महर्षियों नें केवल धर्मव्यवस्था, दर्शन, ज्योतिष तथा कर्मकांड में ही नहीं बल्कि स्थापत्य कला, चिकित्साविज्ञान, खगोलविज्ञान, यन्त्रनिर्माण इत्यादि वैज्ञानिक क्षेत्र में भी विश्व का सफल नेतृ्त्व किया था।
महर्षि भारद्वाज प्रणीत "यन्त्र सर्वस्व" नामक ग्रन्थ मननीय है।
उक्त ग्रन्थ के वैमानिक प्रकरण में सामरिक एवं नागरिक दोनों प्रकार के विमानों के निर्माण का इतिहास  यन्त्र, उपयन्त्र, शत्रु के साथ युद्ध करने की विधि, अपने निर्माण की रक्षा, शत्रु के ऊपर धुँआ छोडना, उनको डराने के लिए भीषण आवाज करना, आग्नेयास्त्रों का प्रयोग करना इत्यादि विभिन्न विषयों का सांगोपांग वर्णन है। महर्षि भारद्वाज के शब्दों में पक्षियों की भान्ती उडने के कारण वायुयान को विमान कहते हैं। वेगसाम्याद विमानोण्डजानामिति ।।
विमानों के प्रकार:- शकत्युदगमविमान अर्थात विद्युत से चलने वाला विमान, धूम्रयान(धुँआ,वाष्प आदि से चलने वाला), अशुवाहविमान(सूर्य किरणों से चलने वाला), शिखोदभगविमान(पारे से चलने वाला), तारामुखविमान(चुम्बक शक्ति से चलने वाला), मरूत्सखविमान(गैस इत्यादि से चलने वाला), भूतवाहविमान(जल,अग्नि तथा वायु से चलने वाला)।
इतना ही नहीं इसी वैमानिक प्रकरण के "अहाराधिकरण" नामक खण्ड में विमानयात्रियों एवं चालकों के आहार अर्थात भोजन व्यवस्था का पूर्ण विवेचन किया गया है। उक्त आहाराधिकरण का पहला सूत्र है "आहार कल्पभेदात"  अर्थात वायुयान यात्रियों को आशानकल्प नामक कहे ग्रन्थ में कहे गए अनुसार ही भोजन व्यवस्था करनी चाहिए। यहाँ जिस आशानकल्प नामक ग्रन्थ का जिक्र किया गया है, दुर्भाग्य से वो ग्रन्थ आज लुप्त हो गया है। लेकिन जब महर्षि भारद्वाज नें अपने ग्रन्थ में इसका जिक्र किया है तो इतनी बात तो अवश्य स्पष्ट हो जाती है कि वो ग्रन्थ उनसे भी पूर्वकालीक तथा अत्यन्त प्राचीन है और साथ ही प्रमाणिक एवं शिष्ट सम्मत भी।
आगे महर्षि लिखते हैं कि विमान में भोजन व्यवस्था सर्वदा समयानुसार होनी चाहिए साथ ही भोजन को आकाश के दूषित वातावरण एवं विमान के विषैले गैस के प्रभाव से भी बचाना चाहिए।  यदि विमान में किसी कारणवश  स्थूल भोजन न मिले या असुविधा हो अथवा अरूचिकर हो तो हल्का एवं सूखा भोजन भी ग्रहण किया जा सकता है। रूचि के अनुसार कन्दमूल फल इत्यादि भी ग्राह्य हैं ।
महर्षि अगस्तय कृ्त "अगस्त्यविमानसंहिता" मे भी यह सिद्धान्त स्थिर किया गया है कि जिस प्रकार जल में नौकाएं तैरती हैं, उसी प्रकार अन्तरिक्ष में वायुभार आदि के सन्तुलन से जो यान गमनागमन करे ---वह विमान है। जले नौकेव यदयान विमान व्योम्नि कीर्तीतम ।।


खैर ये तो बात हुई अति प्राचीन काल की लेकिन यदि मैं आप लोगों से ये कहूँ कि इसी आधुनिक युग में जब 17 दिसंबर सन 1903 में राईट बन्धुओं द्वारा विमान का आविष्कार किया गया तो उससे 8 वर्ष पूर्व ही भारत में विमान का आविष्कार हो चुका था तो शायद आप लोग विश्वास नहीं करेंगें। आप में से कुछ लोग इसे शायद निरा झूठ या "गप्प" भी कह दें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी । लेकिन ये बिल्कुल सच है । जी हाँ, सन 1895 में भारतवर्ष में मुम्बई के चौपाटी बीच पर पंडित श्री शिवकर बापू तलपदे जी(जो कि आजीवन भारतीय पद्धति से विमान निर्माण में लगे रहे) ने सम्पूर्ण भारतीय तकनीक से निर्मित " मरूत्सखा" नामक विमान बनाकर उसे 18 फिट ऊपर आकाश में उडाया भी था । महाराज सयाजीराव गायकवाड तथा श्रीरानाडे आदि विशिष्ट व्यक्तियों के समक्ष सम्पन इस कार्यक्रम का सम्पूर्ण सचित्र विवरण तात्कालिक केशरी न.भा.टा. तथा धर्मयुग के प्रथम अंक में प्रकाशित हुआ था । महाराजा बदौडा ने इस को आगे बढाने के लिए आर्थिक सहायता की भी घोषणा की थी...लेकिन ब्रिटिश सरकार के चलते यह संभव नहीं हो पाया। बाद में ब्रिटेन की "रेले" नाम की एक कम्पनी नें उस विमान का  ढाँचा मय सभी अधिकार खरीद लिए । 

अन्त में मैं आप लोगों से जानना चाहूँगा कि क्या उपरोक्त विवरण आपको ये विश्वास नहीं दिलाता कि प्राचीन काल में विमान विद्या कपोल कल्पना न होकर एक यथार्थ था। बेशक कुछ लोग मरते दम तक भारतीय ज्ञान-विज्ञान की सर्वोच्चता को अस्वीकार कर इन्हे कपोल कल्पना ही मानते रहें,लेकिन वास्तविकता तो ये है कि   ये सच है ओर ऎसे ही न जाने कितने अगिणित विश्वासों को सार्थक करने एवं अपनी सत्यता की सिद्धी हेतु हमारे सैंकडों हजारों ग्रन्थ आज भी सत्यन्वेषियों की राह देख रहे हैं।

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ग्रहों का हमारे शरीर पर पडने वाला प्रभाव और रोगों से बचाव

>> Wednesday 23 December 2009


यह तो सर्वविदित है कि मानवी सृ्ष्टि पंचभौतिक है और पंचभूतों (जल,अग्नि,वायु,पृ्थ्वी,आकाश) के गुण तथा प्रभाव से ही यह सर्वदा प्रभावित होती है। इन्ही पंचतत्वों का अन्तर्जाल कहीं पर सूक्ष्म तो कहीं पर स्थूल रूप से प्रकट एवं अप्रकट स्वरूप में विद्यमान रहता है। इनकी विशेषता यह भी है कि परस्पर सजातीय आकर्षण के साथ ही विजातीय सश्लेषण में विशिष्ट गुणों की उत्पत्ति भी देखी जाती है।
ग्रह,नक्षत्र,तारे,वनस्पतियाँ,नदी,पर्वत,समस्त जीव जन्तु इत्यादि इन्ही पंचभूतों से निर्मित हुए हैं।  वैदिक ज्योतिष की बात की जाए तो इसके आधार में "यथा पिंण्डे तथा ब्राह्मंडे" का यही एक सूत्र काम करता है। इसी आधार पर ग्रहों एवं नक्षत्रों से पृ्थ्वी पर उपस्थित प्राणियों के साथ आन्तरिक संबंध निरूपित होते हैं। अन्य पिण्डों के सापेक्ष सौरमंडल के पिण्डों का आपस में इतने निकट का सम्बंध है , जिस प्रकार से की एक मोहल्ले में बने हुए घरों का परस्पर सम्बंध एवं प्रभाव होता है।
इन ग्रह पिण्डों का पृ्थ्वी पर विद्यमान समस्त जड चेतन पदार्थों पर होने वाले प्रभावों का अध्ययन तो हमारे ऋषि-मुनियों द्वारा युगों पहले ही ज्ञात कर लिया गया था। केवलमात्र स्थूल प्रभाव ही नहीं अपितु उनके सूक्ष्मतम प्रभाव के सम्यक विवेचन का नाम ही वैदिक ज्योतिष है।
अन्य जीवों की अपेक्षा मानवी मस्तिष्क की जटिलता तो सर्वविदित ही है।
ह्रदय की स्पन्दनशीलता(धडकनों) में विकृ्ति आने पर जिस ह्रदय रोग(heart attack) का आधुनिक तकनीक से निदान एवं इलाज किया जाता है, उसको सूर्य ग्रह के साथ संयुक्त कर मनुष्य के सूक्ष्म अवयव पर पडने वाले सूर्य के प्रभाव को स्वीकार किया गया है।
सूर्य अग्नि तत्व का उत्पादक होने के कारण ह्रदय की उष्मा तथा उर्जा प्रदान करने वाला महत्वपूर्ण ग्रह है। अब तक मेरा अनुभव यह है कि ग्रीष्म ऋतु में अग्नि तत्व की वृ्द्धि होने के कारण सबसे ज्यादा हार्ट अटैक भी इसी मौसम में होते हैं। यहाँ पश्चिम भक्तों को मेरा ये चैलेन्ज है कि इस कथन को गलत सिद्ध कर के दिखा दें तो भविष्य में इसी ब्लाग पर मेरा प्रत्येक लेख आपको ज्योतिष के विरोध में ही लिखा मिलेगा। सूर्य को जगत की आत्मा कहने के पीछे भी यही रहस्य छिपा हुआ है।
चन्द्रमा मन का कारक ग्रह है, जो "चन्द्रमा मनसा जातो" इस वाक्य से सुप्रमाणित है। चन्द्रमा अपनी कलाओं के माध्यम से ही हमारे मन को संचालित करता है। पूर्णिमा को जब पूर्ण चन्द्रोदय होता है, उस समय समुद्र में ज्वार भाटा उत्पन होता है और मनुष्यों में मानसिक रोगों का आवेग भी सर्वाधिक रूप में इसी तिथि को दिखाई देता है। इसीलिए हमारे पूर्वज ऋषि मुनियों द्वारा पूर्णिमा के दिन व्रत, तीर्थ-स्नान, पूजन एवं जप इत्यादि का विधान बनाया गया है, जिससे कि मनुष्य का मानसिक संतुलन बना रहता है।
सूर्य और चन्द्रमा के अतिरिक्त अन्य ग्रहों के पंचतत्वात्मक प्रतिनिधित्व को इस प्रकार निरूपित किया गया है।
मंगल अग्नि तत्व का, बुध पृ्थ्वी तत्व का, बृ्हस्पति आकाश तत्व का, शुक्र जल तत्व का और शनि वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य के शरीर में इन तत्वों की कमी अथवा वृ्द्धि का कारण तात्कालिक ग्रह स्थितियों के आधार पर जानकर ही कोई भी विद्वान ज्योतिषी भविष्य में होने वाले किसी रोग-व्याधी का बहुत ही आसानी से पता लगा लेता है। क्यों कि इन पंचतत्वों का असंतुलन एवं विषमता ही शारीरिक रोग-व्याधी को जन्म देता है।  
इसलिए प्राचीनकाल में ज्योतिष के विद्यार्थी को आयुर्वेद की शिक्षा भी साथ ही प्रदान की जाती थी तथा चिकित्सक ,वैधक भी ज्योतिष विद्या में पारंगत हुआ करते थे । जिससे कि रोगी के शरीर में जिस भी तत्व की कमी या अधिकता है, उसे जानकर शरीर में विद्यमान अन्य तत्वों के साथ उसका उचित संतुलन रखा जा सके।
जैसे कि मान लीजिए किसी व्यक्ति पर सूर्य ग्रह का विशेष प्रभाव है तो उसके शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता होगी । अब यदि वो व्यक्ति अधिक मात्रा में जलीय पदार्थो का सेवन करे तो उसके शरीर में अग्नि तत्व की अधिकता का कोई दुष्प्रभाव नहीं हो पाएगा अर्थात जल तत्व को बढाकर अग्नि तत्व की विषमता को कम किया जा सकता है । ठीक इसी प्रकार से शरीर में अन्य तत्वों का भी सही सन्तुलन बनाए रखा जा सकता है।
 

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शनि गोचर भ्रमण का विभिन्न राशियों पर प्रभाव (17 दिसंबर 2009 से 13 जनवरी 2010 तक)..

>> Friday 18 December 2009

इस समय गोचर भ्रमण में शनि ग्रह मार्गीय गति से चल रहे हैं,जो कि दिनाँक 13 जनवरी 2010 तक मार्गीय अवस्था में ही रहेंगें । कल दिनाँक 17 दिसंबर को शनि ग्रह का हमारे मन के अधिपति चन्द्रमा के हस्त नक्षत्र में प्रवेश हुआ है। 
आईये जानते हैं कि इस स्थिति का उपरोक्त समयावधि(17/12/2009 से 13/01/2010) में विभिन्न राशियों पर क्या प्रभाव रहेगा।



मेष राशि:- आपके लिए षष्ठस्थ शनि उत्तम है । विद्यार्जन तथा धनार्जन में मनोनुकूल सफलता प्राप्त होगी । स्त्री-बच्चों तथा निकट संबंधीजनों से भावनात्मक सम्बंध प्रगाढ होंगें । चिकित्सा क्षेत्र से जुडे व्यक्तियों को कार्य व्यवसाय में विभिन्न तरह की परेशानियों का सामना करना पडेगा । जो लोग भ्रमण के कार्यों में संलग्न हैं, उनके लिए समय कहीं अच्छा व्यतीत होगा ।

वृ्ष राशि :- आपके लिए पंचंम शनि मध्यम फल कारक है । विद्या- संतान और दूरस्थ मित्रों के प्रति चिन्तित रहना होगा । कोई भी कार्य आसानी से नहीं बन पायेगा । स्वभाव में क्रोध की मात्रा बढेगी । जो लोग अभक्ष्य पदार्थों(माँस,शराब इत्यादि) का त्याग कर चुके हैं, उनका मन पुन: इन पदार्थो के प्रति लालायित होने लगेगा ।

मिथुन राशि:- आप लोगों के लिए चतुर्थस्थ शनि अशुभ फलदायी है । किसी भी प्रकार के ऋण के लेन-देन से यथासंभव बचना ही आपके लिए हितकारी रहेगा । गलत लोगों की संगति हानि का कारण सिद्ध होगी । व्यय की अधिकता रहेगी । फालतू की यात्राएँ करनी पडेगी तथा किसी स्वजन के प्रति मन मे शंका भाव जागृ्त होने लगेंगें ।

कर्क राशि:- आप लोगों के लिए तृ्तीयस्थ शनि लाभकारी है । बुद्धि में नवीनता का उदय होगा । किसी भी कार्य के लिए पुरूषार्थ पहले से कहीं अधिक करना पडेगा किन्तु सफलता निश्चित है । लाभ प्रदायी अवसरों की प्राप्ति होगी। मन में प्रफुल्लता रहेगी । भाई-बहिन और संतान पक्ष की ओर से शुभ समाचार सुनने को मिलेंगें । अतिथियों का आवागमन लगा रहेगा । जीविकोपार्जन की दृ्ष्टि से आपका समय सुखमय व्यतीत होगा ।

सिँह राशि :- आपके लिए द्वितीयस्थ शनि पूज्य है । आर्थिक लेन-देन से छवि धूमिल पडने लगेगी । मित्रों की ओर से खीँचतान लगी रहेगी । परिवार के किसी नौकरीपेशा सदस्य की उन्नति में बाधाएँ उत्पन होने लगेंगी । अक्सर रविवार की रात्रि में और सोमवार को प्रात:काल तमाम कष्ट, परेशानियाँ बढती हुई प्रतीत होंगी ।

कन्या राशि:- कन्या राशि के लिए प्रथम भाव स्थित शनि मध्यम फलदायी रहेगा । रोजी-रोटी की व्यवस्था में कुछ व्यवधान तो अवश्य उत्पन होंगे साथ ही व्यय भार भी बढने लगेगा किन्तु फिर भी इस प्रकार की कोई स्थिति निर्मित नहीं होगी, जिसे कि आप स्वविवेक से नियन्त्रित न कर सकें । परिवार में किसी माँगलिक कार्य के सम्पादन की योजना पर विचार विमर्श होगा।

तुला राशि:- आपके लिए गोचर शनि की यह स्थिति पूर्णत: उपयुक्त नहीं कही जा सकती । आय में कमी स्पष्ट रूप से दृ्ष्टिगोचर हो रही है । अपने किसी भाई अथवा वयोवृ्द्ध जन से मतभेद निर्मित होंगें । यात्राएँ कष्टकर सिद्ध होंगी । मानसिक चिन्ता, तनाव तथा मन में किसी अज्ञात भय/आशंका की उत्पत्ति होगी । अपनी कर्मनिष्ठा को सुरक्षित रखकर ही आप उपरोक्त वर्णित कष्टसाध्य स्थितियों से पार पा सकते हैं ।

वृ्श्चिक राशि:- आप लोगों के लिए ये स्थिति पूर्णत: कल्याणकारी है । मन और आत्मा की शक्ति सुदृ्ड बनेगी । व्यापारिक उदेश्य फलीभूत होंगे । मित्रों से मदद मिलेगी । नये कामों की ओर रूचि बढेगी । किसी महिला मित्र का सम्पर्क लाभवर्धक रहेगा। शारीरिक सुख में किन्चित कमी अवश्य रहेगी, वायु विकार की संभावना है ।

धनु राशि:- धनु राशि वालों के लिए ये शनि शुभ है । जीवनसाथी तथा बच्चों का परामर्श मानने में ही भलाई होगी । किसी भी विषय में दिया गया उनका परामर्श आपके लिए हितकारी रहेगा । किसी बाह्य विवाद की स्थिति में अपनी विजय निश्चित समझिए । दैनिक जीवन सुख पूर्वक व्यतीत होगा । घर के छोटे बडे सदस्यों का सहयोग मिलेगा ।

मकर राशि :- आप लोगों के लिए ये स्थिति मध्यम फलदायी है । आजीविका का समुचित साधन उपलब्ध रहेगा । परिवार के किसी बुजुर्ग व्यक्ति की आज्ञा मानकर चलने में भलाई होगी । आपके पद, अधिकार और कर्तव्यों की सुरक्षा यथावत रहेगी । अन्य सब प्रकार का वातावरण सामान्य रहेगा किन्तु नींद में कमी जरूर रहेगी ।

कुम्भ राशि:-आप लोगों के लिए अष्टम शनि की स्थिति मिश्रित फलदायी रहेगी । चलते फिरते पाँव, टखने, घुटने इत्यादि किसी अंग में चोट लगने का भय है । गुरूस्थल, धर्मस्थल अथवा कहीं तीर्थ भ्रमण का संयोग निर्मित होगा । आय यथावत रहेगी किन्तु खर्चों की अधिकता रहेगी । परिवार से इतर किसी बाह्य स्त्री से कष्टकर प्रभाव मिलेगा ।

मीन राशि:- आपके लिए सप्तम शनि पूज्य है, इसे कंण्टक शनि भी कहा जाता है । अत: स्वास्थय पर थोडा प्रतिकूल प्रभाव पडेगा । परिवार के वृ्द्धजनों को मानसिक एवं शारीरिक परेशानियों का सामना करना पडेगा । घर परिवार तथा कार्यक्षेत्र के मामलों में भाग दौड बढ जाएगी किन्तु उस भागदौड का आपको यथोचित लाभ भी प्राप्त होगा । आर्थिक स्थिति ओर अच्छी होने लगेगी ।

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भारतीय संस्कृ्ति का महान प्रतीक चिन्ह-----स्वस्तिक(a symbol of life and preservation )

>> Tuesday 15 December 2009

हिन्दू धर्म जितना विशाल और गहन है,उसकी मान्यताएं और प्रक्रियाएं भी उतनी ही विशद और विस्तृ्त हैं । आज हम देखते हैं कि जागरूकता की अधिकता के चलते बहुत से व्यक्ति विशेष रूप से पश्चिमी सभ्यता से अति प्रभावित लोग, अपने धर्म से संबंधित मान्यताओं,रीति-रिवाजों एवं कर्मकांडों पर शंका व्यक्त करने लगे हैं ।बहुत ही बातों को बिना जाने-समझे सिर्फ उन्हे ढकोसला एवं अनावश्यक समझने लगे हैं । जब कि यदि वे इन सब चीजों,प्रक्रियाओं के बारें में गहराई से मनन करें तो पाएंगें कि हिन्दू धर्म विश्व का एकमात्र ऎसा धर्म है जो कि अपने प्रत्येक कर्म,संस्कार और परम्परा में पूर्णत: वैज्ञानिकता समेटे हुए है । प्राचीन काल में शिक्षा पद्धति ऎसी थी कि बालकों को प्रारंभ से ही धर्म के बारे में विस्तृ्त जानकारी दी जाती थी,जिससे कि उनकी आस्था स्वधर्म और परम्पराओं के प्रति बनी रहे........ओर वो उनका पालन सिर्फ एक दिखावे के लिए नहीं अपितु आन्तरिक श्रद्धा भाव से करें । किन्तु आज स्थिति ऎसी नहीं है । आज न तो हमारी शिक्षा प्रणाली ऎसी है कि बच्चों को इस प्रकार की शिक्षा दी सके और न ही ऎसे विद्वान आचार्य ही दिखाई पडते हैं जो कि धर्म के क्षेत्र में समाज को एक सही मार्ग दिखा सकें ।
जैसे कि ये तो सर्वविदित है कि प्रत्येक कार्य के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य छिपा होता है,क्यों कि कार्य हमेशा कारण से ही उपजता है । यदि एक स्त्रोत है तो दूसरा उसकी परिणति है । हिन्दू धर्म के अनुष्ठानों,परम्पराओं,मान्यताओं,सिद्धान्तों इत्यादि के मूल में भी सटीक वैज्ञानिक कारण निहित हैं । इन्ही में से कुछ कारणों को यहाँ उदघाटित करना हमारे इस ब्लाग का उदेश्य रहा  है । आज बात करते हैं---भारतीय संस्कृ्ति में आदिकाल से प्रयोग किए जा रहे प्रतीक चिन्ह स्वस्तिक की---------

स्वस्तिक चिन्ह:--  भारतीय संस्कृ्ति में वैदिक काल से ही स्वस्तिक को विशेष महत्व प्रदान किया गया है । यूँ तो बहुत से लोग इसे हिन्दू धर्म का एक प्रतीक चिन्ह ही मानते हैं ।  किन्तु वे लोग ये नहीं जानते कि इसके पीछे कितना गहरा अर्थ छिपा हुआ है । सामान्यतय: स्वस्तिक शब्द को "सु" एवं "अस्ति" का मिश्रण योग माना जाता है । यहाँ "सु" का अर्थ है--- शुभ और "अस्ति" का--- होना 
संस्कृ्त व्याकरण अनुसार "सु" एवं "अस्ति" को जब संयुक्त किया जाता है तो जो नया शब्द बनता है--वो है "स्वस्ति" अर्थात "शुभ हो", "कल्याण हो" ।
मानक दर्शन अनुसार स्वस्तिक दक्षिणोन्मुख दाहिने हाथ की दिशा (घडी की सूई चलने की दिशा) का संकेत तथा वामोन्मुख बाईं दिशा (उसके विपरीत) के प्रतीक हैं । दोनों दिशाओं के संकेत स्वरूप  दो प्रकार के स्वस्तिक स्त्री एवं पुरूष के प्रतीक के रूप मे भी मान्य हैं । किन्तु जहाँ दाईं ओर मुडी भुजा वाला स्वस्तिक शुभ एवं सौभाग्यवर्द्धक हैं ,वहीं उल्टा (वामावर्त) स्वस्तिक को अमांगलिक,हानिकारक माना गया है ।
प्राचीन काल में राजा महाराज द्वारा किलों का निर्माण स्वस्तिक के आकार में किया जाता रहा है ताकि किले की सुरक्षा अभेद्य बनी रहे। प्राचीन पारम्परिक तरीके से निर्मित किलों में शत्रु द्वारा एक द्वार पर ही सफलता अर्जित करने के पश्चात सेना द्वारा किले में प्रवेश कर उसके अधिकाँश भाग अथवा सम्पूर्ण किले पर अधिकार करने के बाद नर संहार होता रहा है । परन्तु स्वस्तिक नुमा द्वारों के निर्माण के कारण शत्रु सेना को एक द्वार पर यदि सफलता मिल भी जाती थी तो बाकी के तीनों द्वार सुरक्षित रहते थे । ऎसी मजबूत एवं दूरगामी व्यवस्थाओं के कारण शत्रु के लिए किले के सभी भागों को एक साथ जीतना संभव नहीं होता था । यहाँ स्वस्तिक किला/दुर्ग निर्माण के परिपेक्ष्य में "सु वास्तु" था ।
स्वस्तिक का महत्व सभी धर्मों में बताया गया है। इसे विभिन्न देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वस्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वस्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया के देशों में स्वस्तिक चिन्ह मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता रहा है। नेपाल में हेरंब, मिस्र में एक्टोन तथा बर्मा में महा पियेन्ने के नाम से पूजित हैं। आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड के मावरी आदिवासियों द्वारा आदिकाल से स्वस्तिक को मंगल प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा हैं।
यदि आधुनिक  दृ्ष्टिकोण से देखा जाए तो अब तो विज्ञान भी स्वस्तिक,  इत्यादि माँगलिक चिन्हों की महता स्वीकार करने लगा है । आधुनिक विज्ञान ने वातावरण तथा किसी भी जीवित वस्तु,पदार्थ इत्यादि के उर्जा को मापने के लिए विभिन्न उपकरणों का आविष्कार किया है ओर इस उर्जा मापने की इकाई को नाम दिया है---"बोविस" । मृत मानव शरीर का बोविस शून्य माना गया है और मानव में औसत ऊर्जा क्षेत्र 6,500 बोविस पाया गया है। स्वस्तिक में इस उर्जा का स्तर  1,00,0000 बोविस है। यदि इसे उल्टा बना दिया जाए तो यह प्रतिकूल ऊर्जा को इसी अनुपात में बढ़ाता है। इसी स्वस्तिक को थोड़ा टेड़ा बना देने पर इसकी ऊर्जा मात्र 1,000 बोविस रह जाती है।
इसके साथ ही विभिन्न धार्मिक स्थलों यथा मन्दिर,गुरूद्वारा इत्यादि का ऊर्जा स्तर काफी उंचा मापा गया है जिसके चलते वहां जाने वालों को शांति का अनुभव और अपनी समस्याओं,कष्टों से मुक्ति हेतु मन में नवीन आशा का संचार होता है। यही नहीं हमारे घरों,मन्दिरों,पूजा पाठ इत्यादि में प्रयोग किए जाने वाले अन्य मांगलिक चिन्हों यथा ॐ इत्यादि में भी इसी तरह की ऊर्जा समाई है। जिसका लाभ हमें जाने अनजाने में मिलता ही रहता हैं।

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भाग्य और पुरूषार्थ का महत्व-------(आधुनिक दृ्ष्टिकोण)

>> Friday 11 December 2009

पिछले लेख में हम बात कर रहे थे कि जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य दोनों का ही अलग अलग महत्व है । ये ठीक है कि पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है लेकिन सिर्फ इतना कह देने भर से भाग्य का महत्व किसी भी तरह से कम नहीं हो जाता । बहुत से ऎसे भी लोग हैं जो कि भाग्य जैसे किसी शब्द को ही पूरी तरह से नकार देते हैं । उन्होने अपने मन में कुछ ऎसी धारणाऎँ बना रखी हैं कि भाग्य को स्वीकार कर लेने से इन्सान में कर्म करने के प्रति निष्क्रियता आ जाती है । जब कि वास्तव में ऎसा नहीं है।
चलिए विषय को आगे बढाते हुए हम इसी को जानने का प्रयास करते हैं कि भाग्य और पुरूषार्थ वास्तव में क्या हैं ? इसे समझने के लिए हमें कर्मफल की कार्यप्रणाली को जानना होगा क्यों कि भाग्य और पुरूषार्थ का ये सारा रहस्य इन्ही कर्मों में समाहित है। जैसा कि आप सब जानते हैं कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है---संचित कर्म, क्रियामाण कर्म और प्रारब्ध(भाग्य)जो कर्म अब हम लोग कर रहे हैं वे वर्तमान में क्रियामाण हैं,जो बिना फलित हुए अर्थात जिनका अभी हमें कोई फल प्राप्त नहीं हुआ है वो हैं हमारे संचित कर्म इन्ही संचित कर्मों में से जो पक कर फल देने लगते हैं उन्हे प्रारब्ध कहा जाता हैं

सबसे पहले हम संचित कर्मों का विचार करते हैं। ये वे कर्म हैं जिनका फल हमें इस जन्म में भोगने को नहीं मिलता बल्कि किसी अन्य जन्म में प्राप्त होता है। इन कर्मों को हम वंशशास्त्र की परिभाषा में रिसेसिव्स करैक्टर्स (recessive characters) की श्रेणी में रख सकते हैं । ये वे करैक्टर्स हैं , जो कि हमारे इस जन्म में सुप्त रहते हैं और अगले या ओर आगे किसी जन्म में "जीन्स'" के योग्य संयोग से दृ्ष्टिगोचर हो सकते हैं । वैदिक ज्योतिष में किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली का पंचम भाव(fifth house) तथा पंचमेश उसके संचित किए गये कर्मों को सूचित करता है ।
कर्म का दूसरा विभाग है "प्रारब्ध" । ये वें कर्म हैं जिनका फल हमें अपने इस जन्म में ही भोगना होता है । शास्त्रों में इन्ही को उत्पति कर्म भी कहा गया है । modern science (बायोलाजी) की विचारसारिणी से इसका मेल मिलाया जा सकता है । "gemetes"(sperm & ovum)  के मिलने पर अर्थात गर्भधारण के समय ही उस जीव के भाग्य का निर्माण हो जाता है ओर उसे बदलने की शक्ति उस जीव के हाथ में नहीं होती ।  (at the time of the union of the gametes is decided the fate of the zygote or the individual as also the gametes it will produce & it is beyond the power of the zygote to alter it )   अर्थात जब गेमिटस (sperm & ovum) या शुक्रशोणित मिलते हैं, तो उनके अन्दर के क्रोमोसोम्स पर "जीन्स" के संयोग पर उस व्यक्ति के भाग्य का निर्णय हो जाता है और चूँकि ये "जीन्स" बाद में किसी भी तरह से बदले नहीं जा सकते, इस कारण उस मनुष्य के भाग्य का निर्णय इसी मिलन में हो जाता है । इन्ही को उपर्युक्त विवेचन में प्रारब्ध या उत्पत्ति कर्म ये संज्ञाएं दी गई हैं । इससे स्पष्ट है कि प्रयत्न के बिना जो सुख-दुख इत्यादि हमें अवश्यमेव भोगने पडते हैं, वे सारे प्रारब्धाधीन ही हैं ।
वास्तव में देखा जाए तो प्रारब्ध कोई स्वतन्त्र शक्ति नहीं है । मनुष्य के कर्म अर्थात गर्भधारणा के समय स्त्री-पुरूष से प्राप्त "जेनीज" का संयोग और उसकी आधिभौतिक तथा अधिदैविक परिस्थिति, इन कारणों से जो भोग हमें भोगने पडते हैं, तथा बिना किसी विशेष प्रयत्न के उनकी अनिवार्यता------सिर्फ इतना ही अर्थ प्रारब्ध(भाग्य) शब्द से अपेक्षित है।  क्यों कि बुद्धि, ज्ञानार्जन, सुख-दुख, गुणावगुणों का उदय, अनुवांशिक कर्म, तथा हमें अपने जीवन में प्राप्त होने वाली समस्त परिस्थितियाँ----इसी एक शब्द "प्रारब्ध"(भाग्य) में ही समाहित हो जाती हैं ।
इस प्रकार प्रारब्ध(भाग्य) में वे सारे कर्मो का समावेश किया जा सकता है जो मनुष्य को उसकी गर्भावस्था में तथा जन्म के बाद प्राप्त होते हैं या करने पडते हैं । क्यों कि अपने जीवन के इस सारे काल में मनुष्य को अपने माता पिता से प्राप्त आनुवांशिक गुणधर्म, विद्यार्जन करने की उसकी पारिवारिक परिस्थिति, तथा जिस समाज का वह अंश होता है, उस समाज का नैतिक स्तर ---ये सब चीजे व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं होती या कहें कि इन पर उसका कोई बस नहीं चलता । ये सभी बातें उसे जिस कर्म को करने को उद्युत(विवश) करती हैं, वही उसे अपना कर्म समझकर करनी पडती हैं और वह उन्हे करता है । क्यों कि इस समय उसे व्यक्तिश: स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं होती और वही उन कर्मों की अनिवार्यता है । इन्सान का प्रारब्ध(भाग्य) गर्भ में आने से लेकर अन्तिम समय तक घडी की सूँई की भान्ती सदैव उसके साथ चलता है । वैदिक ज्योतिष अनुसार व्यक्ति के प्रारब्ध के बारे में उसकी जन्मकुंडली के नवम भाव (nineth house) तथा नवमेश  की स्थिति से पता चलता है ।    
अब कर्म के तीसरे विभाग "क्रियामाण" के बारे में बात करते हैं ।  
"क्रियामाण" का अर्थ है---जो अभी चल रहा है या कर रहे हैं । वास्तव में इन्ही क्रियामाण कर्मों का ही दूसरा नाम पुरूषार्थ हैं। ये वे कर्म हैं जिन्हे कि इन्सान अपनी 12 वर्ष की आयु के पश्चात से जीवन के अन्त तक करता है । और ये केवल हमारे भाग्य/प्रारब्ध/नियति/किस्मत/मुक्कदर आदि पर अवलम्बित नहीं हैं अपितु इनके माध्यम से व्यक्ति अपने लिए अच्छे-बुरे, उचित अनुचित कैसे भी मार्ग का अवलम्बन करने को पूर्णतय: स्वतन्त्र है । यहाँ से इन्सान की बुद्धि की स्वतन्त्रता आरम्भ होती है, और स्वयं की शिक्षा, संगति, विवाह,आजीविका,परिवारिक जिम्मेवारियाँ इत्यादि निजी तथा सामाजिक उन्नति का दायित्व उस पर आन पडता है। अब चाहे वो अपनी बुद्धि का सदुपयोग करे अथवा दुरूपयोग किन्तु वो अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता ।
यहाँ मैं इस बात को भी स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि क्रियामाण कर्मों का आरम्भ 12 वर्ष की आयु के पश्चात  इसलिए होता है कि इससे पूर्व की जो अवस्था होती है, उसे बाल्यावस्था कहा जाता है और इस अवस्था में उसका स्वयं का कोई व्यक्तित्व नहीं होता । उसे वही कार्य करने पडते हैं जो कि उसके मातापिता से प्राप्त गुणधर्म तथा उसकी पारिवारिक और सामाजिक स्थिति उससे कराती है । वैदिक ज्योतिष अनुसार इस अवस्था का पूर्णत: संचालन चन्द्र ग्रह के अधीन होता है। इसीलिए 12 वर्ष की आयु तक के बालक के बारे में फलकथन लग्न कुंडली की अपेक्षा चन्द्रकुंडली से किया जाता है।

अब एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, वो ये कि हमारे संचित कर्मों के पुंज में से कब कौन सा कर्म प्रारब्ध बन जाएगा----------यह ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है इस प्रारब्ध को ही भाग्य, तकदीर, luck,मुकद्दर भी कहा जाता है किन्तु अगर कर्मों के इस पूरे चक्र को जरा ध्यान से देखें तो यही दिखाई देगा कि प्रारब्ध(भाग्य) का मूल तो हमारे क्रियामाण कर्म (पुरूषार्थ) ही थे

वस्तुत: क्रियामाण कर्म ही वास्तविक कर्म है क्योंकि कर्ता का स्वातन्त्रय सिर्फ इन्ही तक सीमित है ज्यों ही वह संचित हुआ,कर्म की वास्तविक परिभाषा से बाहर हो जाता है उसे हम कर्मों का लेखा कह सकते हैं,कर्म नहीं और प्रारब्ध(भाग्य) कर्म नहीं अपितु फल है अर्थात वह पक कर फल रूप में परिवर्तित हो चुका है
उसको कर्म सिर्फ इसीलिए कहा जाता है कि फलों का मूल कारण हमारी दृ्ष्टि से ओझल न हो जाए और हम यह न समझ बैठें कि हमारे सुख-दुख, उन्नति-अवनति, हानि-लाभ इत्यादि का हमारे कर्मों से कोई सम्बन्ध नहीं है

आशा करता हूँ कि इस लेख को पढकर उन लोगों की सोच में कुछ परिवर्तन हो सके........ जो कि किसी के मुख से भाग्य शब्द सुनने पर ही उसे कुछ इस प्रकार से देखते हैं मानो कि उनके सामने कोई 18 वीं सदी का कोई प्राणी खडा हो ।

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जीवन में पुरूषार्थ और भाग्य.दोनों का ही अपना अपना महत्व है...............

>> Monday 7 December 2009

"भाग्यं फलति सर्वत्र न विधा न च पौरूषम
    शुराग कृ्त विद्याश्च:,वने तिष्ठंति मे सुता: "
पांडवों की माता कुन्ती श्रीकृ्ष्ण से कहती है कि मेरा पुत्र महापराक्रमी एवं विद्वान है किन्तु हम लोग फिर भी वनों में भटकते हुए जीवन गुजार रहे हैं,क्यों कि भाग्य सर्वत्र फल देता है । भाग्यहीन व्यक्ति की विद्या और उसका पुरूषार्थ निरर्थक है ।
वैसे देखा जाए तो भाग्य एवं पुरूषार्थ दोनों का ही अपना-अपना महत्व है, लेकिन इतिहास पर दृ्ष्टि डाली जाए तो सामने आएगा कि जीवन में पुरूषार्थ की भूमिका भाग्य से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। भाग्य की कुंजी सदैव हमारे कर्म के हाथ में होती है, अर्थात कर्म करेंगे तो ही भाग्योदय होगा। जब कि पुरूषार्थ इस विषय में पूर्णत: स्वतंत्र है ।
माना कि पुरूषार्थ सर्वोपरी है किन्तु इतना कहने मात्र से भाग्य की महता तो कम नहीं हो जाती ।
आप देख सकते हैं कि दुनिया में ऎसे मनुष्यों की कोई कमी नहीं है जो कि दिन रात मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी उनका सारा जीवन अभावों में ही व्यतीत हो जाता है । अब इसे आप क्या कहेंगें ? उन लोगों नें पुरूषार्थ करने में तो कोई कमी नहीं की फिर उन लोगों को वो सब सुख सुविधाएं क्यों नहीं मिल पाई जो कि आप और हम भोग रहे हैं । एक इन्सान इन्जीनियरिंग/डाक्टरी/मैनेजमेन्ट की पढाई करके भी नौकरी के लिए मारा मारा फिर रहा है, लेकिन उसे कोई चपरासी रखने को भी तैयार नहीं, वहीं दूसरी ओर एक कम पढा लिखा इन्सान किसी काम धन्धे में लग कर बडे मजे से अपने परिवार का पेट पाल रहा है ।  अब इसे आप क्या कहेंगें ?
 एक मजदूर जो दिन भर भरी दुपहर में पत्थर तोडने का काम करता है--क्या वो कम पुरूषार्थ कर रहा है ?
अब कुछ लोग कहेंगें कि उसका वातावरण, उसके हालात, उसकी समझबूझ इसके लिए दोषी है ओर या कि उसमें इस तरह की कोई प्रतिभा नहीं है कि वो अपने जीवन स्तर को सुधार सके अथवा उसे जीवन में ऎसा कोई उचित अवसर नहीं मिल पाया कि वो जीवन में आगे बढ सके या फिर उसमें शिक्षा की कमी है आदि आदि...ऎसे सैकंडों प्रकार के तर्क हो सकते हैं । मैं मानता हूँ कि इस के पीछे जरूर उसके हालात, वातावरण, शिक्षा दीक्षा, उसकी प्रतिभा इत्यादि कोई भी कारण हो सकता है लेकिन ये सवाल फिर भी अनुतरित रह जाता है कि क्या ये सब उसके अपने हाथ में था ? यदि नहीं तो फिर कौन सा ऎसा कारण है कि उसने किसी अम्बानी, टाटा-बिरला के घर जन्म न लेकर एक गरीब के घर में जन्म लिया । है किसी तर्कवादी के पास इस बात का उत्तर?
ये निर्भर करता है इन्सान के भाग्य पर---जिसे चाहे तो आप luck कह लीजिए या मुक्कदर या किस्मत या फिर कुछ भी । यह ठीक है कि इन्सान द्वारा किए गए कर्मों से ही उसके भाग्य का निर्माण होता हैलेकिन कौन सा कर्म, कैसा कर्म और किस दिशा में कर्म करने से मनुष्य अपने भाग्य का सही निर्माण कर सकता है---ये जानने का जो माध्यम है, उसी का नाम ज्योतिष है ।  

क्रमश:......................... 


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मासिक राशिफल----दिसंबर 2009

>> Wednesday 2 December 2009


यह मासिक भविष्यफल जन्मराशि पर आधारित है । अत: सही फलादेश के लिए नामराशि की अपेक्षा अपनी जन्मराशि के अनुसार ही इसे पढें । यदि किसी को अपनी जन्मराशि की जानकारी नहीं है,तो,टिप्पणी अथवा ईमेल के जरिए अपना जन्मविवरण भेज कर अपनी राशि पता कर सकते हैं ।



मेष राशी:-इस महीने का अधिकांश पूर्वार्ध भाग्य की कसौटी पर परखे जाने का समय है। यदि आप किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थान में व्यवस्था संबंधी कार्य देख रहे हैं तो अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर विशेष दृष्टि रखें। यदि आप अपने निजी व्यापार व्यवसाय से संबद्ध हैं तो अधिक कामकाज की नीति को अमल में लाएँ। यही कुछ परिश्रमपूर्ण प्रयास आपके लिए तात्कालिक रूप से लाभप्रद सिद्ध होंगे। महीने के मध्य भाग में नवम् भाव में निर्मित हो रही राहू-सूर्य युति के कारण् स्वभाव में कुछ चिडचिडापन, निराशा और मायूसी का वातावरण निर्मित होने लगेगा। आर्थिक प्रयासों में अधिक सफलता नहीं मिलने से दूसरों पर दोषारोपण कर सकते हैं। परन्तु इसके बजाय आप शांत और मौन रहकर समय को निकाल दें तो अधिक उत्तम रहेगा ।  नेत्र का समीपवर्ती स्थान, सिर, चेहरा इत्यादि अंगों में रोग/चोट की संभावना है--सचेत रहें । आपके द्वारा किए जा रहे प्रयासों के, मास के अन्त तक कुछ सकारात्मक नतीजे निकलने आरम्भ होंगे।
शुभ तिथियां:-1,2,9,11,17,28,30
अशुभ तिथियां:-6,8,10,16,19,23,24,31
उपाय:-- श्री बटुक भैरव स्त्रोत्र का पाठ करें । अपने घर के पूजास्थल में शंख अवश्य रखें  साथ ही नित्यप्रति किसी गरीब को कुछ न कुछ दान भी करते रहें।

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वृ्ष राशी:- इस माह आपके राशी स्‍वामी आपके सारे उपक्रमों में तीव्र गति लाना चाहते हैं। संतान के लिए शुभ समय है, यद्यपि किसी कारणवश आपको चिंता लगी रहेगी। अनावश्‍यक यात्राएं और खर्चे दिख रहे हैं। शत्रु प्रबल होंगे, यात्राएं बढ़ेंगी।व्‍यावसायिक निर्णय लेने में असुविधा होगी परंतु फिर भी कुछ निर्णय आप अनुकूल ले पाएंगे। इसमें वर्तमान स्थितियों की अपेक्षा आपको आगामी समय को ध्‍यान रखना होगा जिसमें कि आप लाभ ले सकेंगे। इस माह मित्र वर्ग का भरपूर सहयोग मिलेगा। मधुमेह के रोगी थोडा सावधानी रखें । 23 से 31 तारीख के मध्य वाहन चलाने में थोडी सावधानी रखें अन्यथा चोट/दुर्घटना का भय है ।

शुभ तिथियां:-1,6,11,16,19,25,27
अशुभ तिथियां:-8,12,18,20,26,31
उपाए:-नित्य गाय को गुड सहित रोटी खिलाएं एवं देवदर्शन हेतु मंदिर अवश्य जाऎं । मस्तक पर नित्य केसर का तिलक लगाएं ।

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मिथुन राशी:- इस महीने जिम्मेदारी बढ़ने से शुरुआत कुछ आर्थिक संकटों से भरी होगी। महीने के पहले 15 दिनों में भविष्य निर्माण संबंधी योजनाएं स्थगित होंगी। साझे सौदे के लिए भी अभी धन खर्च करना उचित नहीं होगा। दूसरे सप्ताह के अंतिम दिनों में रोजगार प्राप्त जातकों को धन प्राप्ति अथवा पदोन्नति के प्रसंग पैदा होंगे।महीने के प्रथम अर्द्ध में परिवार में झगड़ा आपकी जिद करने की आदत के कारण हो सकता है। अत: वाणी पर और व्यवहार में नियंत्रण अवश्य रखें। नए दोस्तों से संबंध सोच-समझकर बनायें। उत्तरार्द्ध में शत्रुओं पर विजय प्राप्त होगी संपत्ति का लाभ होगा। सट्टे के व्यापारी सचेत रहें अन्यथा अचानक आर्थिक हानि का सामना करना पड सकता है । विशेष तौर पर 8 से 13 तारीख तक सट्टा बाजार, शेयर मार्कीट इत्यादि से पूरी तरह से दूर रहें ।

शुभ तिथियां:-5,10,12,21,25
अशुभ तिथियां:-4,8,19,20,22,28,
उपाए:-नित्य श्री बजरंग बाण का पाठ करें एवं अपने पास थोडी सी चांदी,केसर सफेद कपडे में बाँधकर रखें। काले रंग की वस्तुओं,पदार्थों का प्रयोग न करें ।

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कर्क राशी:- व्यवसायिक व कार्यक्षेत्र में सफलता की दृष्टि से यह मास सामान्य रहेगा। माता-पिता के स्वास्थ्य की दृष्टि से समय अच्छा रहेगा तथा उनसे काफी सहयोग मिलेगा। संतान पक्ष से मन प्रसन्न रहेगा। वे आपकी आशाओं पर खरे उतरेंगे।आप कार्यक्षेत्र में अपनी कार्य योजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा कर लेंगे। धन-ऐश्वर्य की भी आपको प्राप्ति होगी। मांगलिक कार्य पर खर्च भी होगा। अन्य व्यय अनुकूल मात्रा में ही होंगे।तीसरे सप्ताह किसी सम्पन्न सहयोगी से लाभ अथवा नए मित्र के आगमन का हर्ष प्राप्त होगा। आर्थिक निवेश के लिए भी समय पूर्णत: अनुकूल है। आप निसंकोच हो कर कैसा भी निवेश कर सकते हैं, मनोनुकूल लाभ प्राप्त होगा ।
शुभ तिथियां:-3,5,7,10,11,21,22,24,25
अशुभ तिथियां:-6,13,19,20,26
उपाय:-- ऊँ गं गणपतये नम: मंत्र का नित्यप्रति जाप करें । सोमवार के दिन चावल का दान करते रहें ।

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सिंह राशी:--प्रयास करने पर इस मास लाभ के अवसर पहले से कहीं बेहतर होंगे। किसी महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त रहेंगे। अनेक समस्याओ के समाधान के अवसर मिलेंगे।किसी प्रभावशाली व्यक्ति सम्पर्क होगा जो भविष्य में आपके लिये लाभदायक सिद्ध होगा। नौकरी में बदलाव की योजना पर विचार कर सकते ह। संतान सम्बन्धी चिन्ता व पारिवारिक मतभेद रहेंगे। उत्तरार्द्ध भाग में व्यवसाय में संघर्ष के बाद आय के स्रोत बढ़ेंगे। भूमि सम्बन्धी कार्यो से लाभ मिलेगा। रुका या उधार दिया धन वसूल होगा। व्यवसाय में उन्नति के अवसर मिलेंगे। धन का अपव्यय अधिक रहेगा। गुप्त परेशानियो का सामना करना पड़ सकता है। चतुराई व विवेक से किये गये कार्यो से लाभ में वृद्धि होने के योग हैं। पूर्व में किए गये निवेश द्वारा इस समय भरपूर लाभ प्राप्ति का योग है। 21 से 29 दिसंबर के मध्य का समय विशेष फलदायी सिद्ध होगा ।
शुभ तिथियां:-2,4,7,11,20,21,26,27,29
अशुभ तिथियां:-3,13,16,18,25,30,31
उपाए:- नित्य प्रात: दही खाकर ही घर से निकलें । रविवार लाल फल,लाल पुष्प भगवान विष्णु जी को अर्पित करें ।

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कन्या राशी:-परिवार में किसी की अस्वस्थता से मन चिन्तित होगा। महत्वपूर्ण क्षेत्रो में चल रहे प्रयत्न सार्थक होंगे। राजनैतिक सक्रीयता बढ़ेगी। शासन-सत्ता के व्यक्तियों से लाभ के अवसर प्राप्त होगा। तारीख 3,8,13,18 को हड़बड़ी में कोई कार्य न करें। अवयस्कता पूर्ण व्यवहार पर नियंत्रण करें। 6,15,20,22,24 तारीखों को परिजनों के स्नेह से सुखद अनुभूति होगी।पारिवारिक वातावरण सौहार्दपूर्ण रहेगा, लंबी दूरी के यात्रा की योजना बन सकती है। भौतिक सुख-साधनों में व्यय की अधिकता रहेगी। जो लोग धातु एवं विधुत संबंधी कार्यों में संलग्न हैं,उनके लिए आगामी मास में भरपूर लाभ प्राप्ति हेतु परिस्थितियों का निर्माण हो रहा है। विलासितादायी वस्तुओं की खरीद पर धन का व्यय होगा । प्रथम सप्ताह सपरिवार किसी आयोजन, समारोह में शामिल होने का अवसर मिलेगा ।

शुभ तिथियां:-6,9,15,20,22,24,29
अशुभ तिथियां:- 3,8,13,16,18,23
उपाय:-  प्रत्येक सोमवार सफेद चंदन की लकडी,चावल मंदिर में चढावें । श्री चंडिका स्त्रोत्र का पाठ करें । सफेद वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग करें ।

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तुला राशी:-पूर्वार्ध में स्वास्थय अच्छा रहेगा, परन्तु उत्तरार्ध में किसी रोग का सामना करना पडेगा। उदर पीडा,शिरोव्यथा,अपच इत्यादि व्याधी से कष्ट संभव है। मित्रों का विशेष सहयोग प्राप्त होगा। किसी नवीन कार्य की योजना फलीभूत हो सकती है। पराक्रम में वृ्द्धि होगी,भाग-दौड से लाभ मिलेगा। जो व्यक्ति विदेश जाने का प्रयास कर रहें हैं उन्हे अपने प्रयत्नों में सफलता प्राप्त होगी। प्रथम पक्ष में विशेष रूप से 1 से 16 तक धनागमन के नए स्त्रोत उत्पन्न होंगे, मन में शुभ विचारों का उदय होगा। नौकरीपेशा लोगों हेतु सलाह है कि उच्चाधिकारियों से संतुलित संभाषण ही अनके लिए हितकर रहेगा, अन्यथा परेशानी का सामना करना पड सकता है। गुप्त शत्रुओं से पूर्णत: सचेत रहें। तारीख 21,22,23 को धनहानि,चोरी,दुर्घटना के प्रति सतर्क रहें।
शुभ तिथियां:- 1,2,5,14,15,16,27,30 
अशुभ तिथियां:-  6,7,8,18,21,22,23
उपाए- नित्य श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें। बुधवार के दिन साबुत मूँग,हरी सब्जी इत्यादि का दान करते रहें । नित्य प्रात: गंगाजल का सेवन करें ।

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वृ्श्चिक राशी:-इस राशी के व्यक्तियों को इस माह कुछेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। मानसिक अशान्ति बनी रहेगी। घर परिवार में शांति रखने के लिए सावधानी पूवर्क रहें। कार्यक्षेत्र में मन लगाकर काम करें, विशेष तौर पर नौकरीपेशा व्यक्ति अनावश्यक झगड़े व बहस से बचें अन्यथा नौकरी बदलने की संभावना निर्मित हो रही है। यह माह विशेष सावधानी से गुजारें। धन हानि, सुख शांति में कमी हो सकती है। भाग्य भाव में नीचराशि का मंगल तथा द्वितीय भाव में सूर्य-राहू युति आर्थिक, मानसिक कष्टों का निर्माण कर रही है। आलस को अपने ऊपर हावी न होने दें । स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। व्यसनों से दूर रहें, आर्थिक तंगी आ सकती है। माह के अन्त में परिस्थितियाँ आपके अनुकूल बनेंगी। आपके रूके हुये कार्य बनेगें। धर्म कार्यों में रूचि, धन लाभ आदि के लिये अवसर बनेगें।

शुभ तिथियां:-1,8,9,11,15,16,19,25,27
अशुभ तिथियां:-3,4,12,18,20,26
उपाए:- किसी कर्मकांडी ब्राह्मण को धार्मिक पुस्तक/ग्रन्थ इत्यादि भेंट स्वरूप प्रदान करें । शनिवार सरसों तेल का छायापात्र दान करें । लाल रंग की वस्तुओं का अधिकाधिक प्रयोग करें ।

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धनु राशी:-इस मास के मध्य भाग तक आपकी राशी पर शुद्ध गोचर प्रभाव कायम रहेगा। कुछ समय के लिए ही सही आपके समस्त कष्ट दूर हो जाएंगे। भोग विलास की सामग्री में वृद्धि होगी । खान पान में समृद्धि आने से स्वास्थ्य भी सुधरेगा। किसी चिरस्थाई लाभ की आशा भी महीने के आरंभिक दिनों में रहेगी। इसके साथ ही शुभ मांगलिक कार्यक्रमों का आयोजन, समवयस्क लोगों से मित्रता एवं मेल मुलाकात का हर्ष भी प्राप्त होगा। महीने का अधिकांश भाग जहाँ संचय संग्रह में व्यतीत होगा, वहीं मान सम्मान का लाभ भी आपको मिलता जाएगा। इस मास के उत्तरार्ध में जीवन साथी के भाग्य द्वारा भी कुछ लाभ प्राप्त  होगा तथा किसी प्रकार के सामूहिक प्रयास का नेतृत्व भी आप करेंगे। संतान की ओर से भी मन प्रसन्न रहेगा तथा स्पष्टवादिता एवं आदर्शपूर्ण विचारधारा कायम रखने वाले सज्जनों तथा घर के बडे-बुजुर्गों का स्नेह, आशीर्वाद भी प्राप्त होता रहेगा।
शुभ तिथियां:-1,5,7,9,10,13,20,25,27
अशुभ तिथियां:-11,16,21,22,23
उपाए:-प्रत्येक शुक्रवार अपने आराध्यदेव के सम्मुख कर्पूर(camphor)जलाएं। श्री राम रक्षा स्त्रोत्र का नित्य पाठ करें । मंगलवार के दिन किसी भिखारी को दोरंगा कंबल दान करें ।

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मकर राशी:- मन प्रफुल्लित रहेगा और कुछ बातें आपके जीवन में अच्‍छी आने वाली है जिनके दृश्‍य आपके सामने आने लगे हैं। साहस उच्‍च स्‍तर का रहेगा जिसके दम पर अद्भुत कार्य संपादन कर पाएंगे।व्‍यावसायिक दृष्टिकोण से कुछ नए संबंध स्‍थापित होंगे जो धन के लिए फायदेमंद रहेंगे परंतु फिर भी आपको कानूनी सावधानी अवश्‍य रखनी चाहिए।स्‍वास्‍थ्‍य में थोडा पेट सबंधी रोग-व्याधी का योग है, सावधानी रखें एवं आलस को अपने पर हावी न होने दें .भाई–बहिनों के संबंध में आप थोड़े व्‍यस्‍त रह सकते हैं । परंतु 12 दिसंबर के पश्चात संतान की ओर से कोई शुभ समाचार प्राप्त होगा । आर्थिक स्थिति मजबूत होगी । कामकाजी महिलाओं के लिए यह समय विशेष लाभकारी सिद्ध होगा ।
शुभ तिथियां:-1,7,11,15,18,23,26,30
अशुभ तिथियां:-3,8,17,21
उपाए:-प्रत्येक बृ्हस्पतिवार को 4 केले धार्मिक स्थल पर चढावें। शनिवार के दिन चमडे की जूती/ चप्पल दान करें ।

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कुंभ राशी:-आप कुछ ऐसा सोच रहे हैं कि आपके आस-पास के लोग बहुत मजबूत होते जा रहे हैं, इस कारण आप असंतुष्ट हैं  आप अपने नजरिए के प्रति अड़ियल न बनें अपितु इसे बदलने का प्रयास करें ताकि वर्तमान  परिस्थितियों के चक्रव्यूह से निकल सकें मास के प्रथम सप्ताह में ग्रह स्थिति अत्यन्त अनुकूल है और इस प्रकार की योगकारक स्थिति जन्म पत्रिका की सामर्थ्य को अचानक बहुत उठा देती है। इस समय सर्वत्र वातावरण अनुकूल रहेगा। दैनिक आय बढ़ेगी, लोगों से सामजस्य बिठाने में मदद मिलेगी और उच्च कोटि के जन सम्पर्कों के कारण आर्थिक लाभ की मात्रा बढ़ेगी। यदि आप नौकरी कर रहे हैं तो यह सर्वश्रेष्ठ समय चल रहा है परन्तु आत्मशाला की प्रवृत्ति के कारण आप इसके सुफलों को कम कर लेंगे। इस मास में आपको केवल यह करना है कि कम बोलना है और स्वयं की पैरवी नहीं करना है। इस समय जो गणित चल रही है, उसमें आपको दीर्घ काल तक लाभ बने रहने की संभावना बन रही है परन्तु वाणी के दोष के कारण लाभ, हानि में नहीं बदल जाए, इसका ध्यान आपको रखना होगा। मास का द्वितीयार्द्ध आपके प्रयासों में वृ्द्धि करने वाला समय है
शुभ तिथियां:-4,14,23,24,25,29,30
अशुभ तिथियां:-7,8,15,20,22,27,31
उपाय: "ऊँ देवकीसुत गोबिन्द वासुदेव जगत्पते" मंत्र का जाप करते रहें। प्रत्येक बृहस्पतिवार पीली वस्तुओं का दान करें। गाय की सेवा करते रहें । नीले वस्त्रों का त्याग करें ।

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मीन राशी:-यह महीना अशुद्ध गोचर के कारण पूर्वार्ध में थोडा स्वास्थ्य को प्रभावित करेगा । भूख न लगना, अपच इत्यादि की शिकायत रहेगी । व्यर्थ की दौड़भाग बढ़ जाने से अथवा अनावश्यक कार्यो के दबाव से हाथ-पैरों की पीड़ा भी व्यथित करेगी । यात्रा आदि में सावधानी आवश्यक है । किसी विशेष कार्य योजना के ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकने से मन में खिन्नता रहेगी। महीने के मध्य भाग में सूर्य के राशी परिवर्तन के कारण विचारों में बदलाव आएगा, शारीरिक कष्टों की निवृत्ति के उपाय कारगर होंगे। कुछ संतोषजनक धन लाभ होने से आर्थिक क्षेत्र में भी सुख शांति कायम रहेगी । मासान्त में ज्ञान विज्ञान अथवा किसी महत्वपूर्ण विषय पर आपकी गतिविधियाँ नियंत्रित हो जाएंगी। तारीख 23 से 29 के मध्य किसी पुराने निवेश से आशानुकूल लाभ प्राप्ति का योग निर्मित होगा। माह के अन्तिम भाग में अचानक किसी यात्रा का कार्यक्रम बनेगा ।

शुभ तिथियां:- 5,13,14,17,23 से 29
अशुभ तिथियां:-3,8,10,12,18,19,30
उपाए:- माता-पिता अथवा घर के अन्य किसी बडे बुजुर्ग के नित्य चरण स्पर्श करें। सोमवार के दिन अपने आराध्यदेव के चरणों में सफेद पुष्प अर्पित करें। रविवार के दिन गेँहूँ अथवा गुड का दान करते करें ।

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आपके सवाल--क्या जन्मकुंडली देखकर बताया जा सकता है कि ये जन्मकुंडली स्त्री/पुरूष/पशु/पक्षी आदि किस की है ?

>> Tuesday 1 December 2009

अक्सर जब भी कोई पाठक मुझसे ज्योतिष अथवा सनातन धर्म के विषय में कोई प्रश्न करता है तो मेरा ये भरकस प्रयास रहता है कि तुरन्त ही उसके सवाल का उत्तर उसे मिल सके। प्रश्न यदि व्यक्तिगत हो तो प्राथमिकता के आधार पर उनका जवाब पहले देने का प्रयास करता हूँ। किन्तु यदि प्रश्न निजि न होकर सामाजिक हो तो यदा कदा समयाभाव के कारण उनके उत्तर देने में देरी हो ही जाती है। आज कुछ ऎसे ही प्रश्नों को लेकर ये पोस्ट लिख रहा हूँ,जो कि ईमेल अथवा टिप्पणी के माध्यम से विभिन्न पाठकों के द्वारा पूछे गये थे किन्तु अभी तक उन्हे व्यक्तिगत रूप से जवाब प्रेषित नहीं कर पाया हूँ। यहाँ इस पोस्ट के जरिये सिर्फ ये सोचकर उन सवालों के जवाब देने का प्रयास कर रहा हूँ कि हो सकता है कि कुछ लोग ऎसे भी हों,जिनके मन में भी ऎसा ही कोई प्रश्न कौंध रहा हो और मेरा जवाब उनके जिज्ञासा भाव का शमन करने और साथ ही कुछ नया जानने,समझने में सहायक हो सकें। किन्तु गोपनीयता बनाए रखने हेतु यहाँ प्रश्नकर्ता के नाम का उल्लेख नहीं किया जा रहा।


 सवाल:- भारतीय ज्योतिष में सूर्योदय से ही वार का प्रारम्भ माना जाता है । पश्चिमी मतानुसार् अर्धरात्री (12 बजे से) आगामी वार की प्रवृ्ति मानी जाती है । कौन सा मत ठीक है ?

ये तो सर्वविदित है कि सूर्य जिस काल अवधि में दिखाई देता है उसे "दिन" और जिस अवधि में वह अदृ्श्य रहता है,उसे रात्रि कहा जाता है । दिन और रात की ये मूल परिभाषा तो समस्त संसार में एक जैसी ही है । तदनुसार भारतीय ज्योतिष शास्त्रीय वार प्रणाली का सिद्धान्त बिल्कुल सही है । वैसे तो पश्चिमी एवं अन्य देशों के लोग भी मूलत: इसी परिभाषा के अनुयायी हैं,लेकिन तीव्रगति के इस आधुनिक युग में अलग अलग देशों में वार प्रारम्भ होने की भिन्न भिन्न प्रणाली होने से व्यवहारिक दृ्ष्टि से बडी भारी अव्यवस्था से बचने के लिए ही स्थानीय स्टैंण्डर्ड टाईम अनुसार अर्धरात्रि 12 बजे से ही वार आरंभ करने की प्रणाली को अपनाया गया है । जो कि मूल रूप से सही न होने पर भी सुविधा की दृ्ष्टि से तो उचित ही है ।

सवाल:- क्या किसी जन्मकुंडली को देखकर ये बताया जा सकता है कि ये जन्मकुंडली लडका,लडकी,पशु या पक्षी में से किसकी है ? क्या ये जान पाना संभव है ?

जन्मकुंडली देखकर जातक के लिंग(स्त्री एवं पुरूष) अथवा उसकी योनि (पशुयोनि,पक्षीयोनि इत्यादि) का निर्धारण कर पाना किसी भी ज्योतिषी के लिए संभव नहीं है ।  क्यों कि जन्म के क्षणों को लिंगभेद अथवा योनिभेद से विभाजित नहीं किया जा सकता । प्रकृ्ति नें ऎसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई है कि समय के इस अन्तराल में केवल पुरूषों का जन्म होगा, इस क्षण में स्त्रियों का, इस क्षण में पशुओं का या कि इस क्षण में सिर्फ पक्षी ही जन्म लेंगें ।  कोई भी प्राणी चाहे वह किसी भी लिंग,जाति अथवा योनि का क्यों न हो, वह किसी भी क्षण में जन्म लेने के लिए स्वतंत्र है ।
अब यदि विज्ञान प्रकृ्ति के नियमों में सेंध लगाकर ये सुनिश्चित करवा सके कि दिनरात के चौबीस घंटों में इतने घंटे इन्सानों के जन्म के लिए रक्षित हैं ओर इतने पशु पक्षियों के लिए तो फिर जरूर बतलाया जा सकता है कि जन्मपत्री इन्सान की है या कि जानवर की :)

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ज्योतिषी कोई भगवान तो नहीं कि आपके भाग्य को बदल डाले ........

>> Tuesday 24 November 2009

आज सबसे पहले तो मैं अपने सभी पाठकों से एक बात कहना चाहूँगा कि इस ब्लाग को आरम्भ करने के पीछे मेरा सिर्फ एक ही उदेश्य रहा है...वो ये कि इसके माध्यम से ज्योतिष एवं संबंधित पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को आमजन तक पहुँचाना तथा तथाकथित पढे लिखे बुद्धिजीवी वर्ग की इन विषयों के प्रति अविश्वास एवं उपेक्षापूर्ण दृ्ष्टिकोण में बदलाव लाना । अपने आरम्भिक काल से ही मेरी ये मान्यता है कि जिस विषय की जानकारी जितने कम लोगों को होती है, उस विषय के प्रति अविश्वास तथा भ्रान्तियाँ भी उतनी ही अधिक देखने को मिलती है । इस ब्लाग के माध्यम से विगत एक वर्ष के दौरान ज्योतिष, मंत्र, संस्कृ्ति एवं अन्य पराविद्याओं के वास्तविक स्वरूप को अत्यन्त सरल और सटीक शब्दों में पाठकों के समक्ष रखा है ओर ये मेरा भरपूर प्रयास रहा है कि इन विषयों की पृ्ष्ठभूमी न रखने वाला व्यक्ति भी इन के बारे में आसानी से समझ सके । नित्य प्रति आप लोगों की तरफ से आने वाले ईमेल तथा फोन इत्यादि से विदित होता है कि मैं अपने इस प्रयास में कुछ हद तक सफल भी हुआ हूँ । ज्योतिष के प्रति लोगों में सकारात्मक दृ्ष्टिकोण का विकास हुआ है। आशा करता हूँ कि अपने इस प्रयास में अब तक जो सहयोग आप लोगों की ओर से मिलता रहा है, वैसा ही भविष्य में भी यूँ ही मिलता रहेगा ।

एक ब्लागर बन्धु जो कि पिछले कईं महीनों से नौकरी के संबंध मे विभिन्न प्रकार की परेशानियों का सामना कर रहे हैं, ओर वो विदेश में सैटल होने का विचारकर इस दिशा में बहुत लम्बे समय से प्रयास भी कर रहे हैं लेकिन वो अपने इन प्रयासों में सफल नहीं हो पाए । कल उन्होने मुझे फोन किया तो कहने लगे कि  "पंडित जी, आपके ब्लाग का मैं नियमित पाठक हूँ । ज्योतिष विषय में रूचि होने के चलते, कुछ नया सीखने, जानने की इच्छा लिए मैं आपके सहित विभिन्न ज्योतिष विद्वानों के लेख पढता रहता हूँ । जिनके जरिए बहुत कुछ नया जानने को भी मिलता है, किन्तु सभी ब्लागस पर मैने ये देखा है कि आप लोग ये तो लिख देते हो कि निकट भविष्य में इन राशी के व्यक्ति को ये समस्याएं आएंगी या कुछ ऎसा अनिष्ट/हानिकारक होने वाला है, लेकिन उसके निवारण/मुक्ति का हल कोई नहीं सुझाता। किसी अन्य ज्योतिषीय ब्लाग पर मैने लिखा हुआ पढा भी है कि "समस्या है तो समाधान भी है " लेकिन उनके किसी भी लेख में मुझे आने वाली समस्याओं, परेशानियों,कष्टों के समाधान के बारे में कहीं कुछ लिखा नहीं मिला । भई जब आप बीमारी बता रहे हो तो उसकी दवा भी तो बताईये न----ऎसा तो डाक्टर भी किसी काम का नहीं जो सिर्फ बीमारी तो बता दे लेकिन उस बीमारी की दवा न दे "।  उनकी बात सुनकर पहले तो मुझे हँसी भी आई लेकिन खैर जब मैने उसके बाद उनकी जन्मकुंडली देखी तो पाया कि विदेश में जाकर निवास करने का उनके भाग्य में किसी भी प्रकार का कोई योग नहीं है ओर वो इस विषय में चाहे लाख प्रयत्न कर लें किन्तु अन्त समय तक सफल नहीं हो सकते । जब उन्हे मैने ये बात स्पष्ट रूप से बता दी तो उनका फिर से वही सवाल था कि कुछ तो ऎसा उपाय बताईये, जिससे कि मेरी विदेश में सैटिंग हो जाए !


तो यहाँ मैं अपने पाठकों से भी वही बात कहना चाहूँगा जो कि मैने उनसे कही है। वो ये कि व्यक्तिगत भविष्यकथन तथा राशीगत भविष्यफल में जमीन आसमान की भिन्नता होती है । किसी भी राशी के अनुसार जो भविष्यफल बताया जाता है वो तात्कालीक ग्रह गोचर भ्रमण के अनुसार होता है । जब कि आपकी जन्मकुंडली जो कि आपके जन्मकालीन ग्रहों पर आधारित होती हैं, वास्तव में वो ही आपके समस्त जीवन का सार है । आप अपने पूर्वार्जित कर्मों के अनुसार जन्म के साथ ही जो कुछ भी हानि-लाभ,सुख-दुख, कर्म-अकर्म, भाग्य-दुर्भाग्य इत्यादि के रूप में अपने साथ संग्रहित कर के लाते हो---उसे जानने का एकमात्र माध्यम सिर्फ आपकी जन्मकुंडली ही है । उसी के आधार पर आपको अपने भावी जीवन में फल की प्राति होती है ।  
अब बात की जाए किसी समस्या के निवारणार्थ किए जाने उपाय की तो---उपाय हमेशा जन्मकुंडली के अनुसार ही फलीभूत होते हैं ओर सबसे बडी बात ये कि उपाय का अर्थ ये नहीं कि उसके जरिए आप किसी भी समस्या से मुक्त हो सकेंगें या कि अपनी इच्छापूर्ती कर सकते हैं । उपाय का अर्थ सिर्फ इतना है कि जो कुछ भी आपके भाग्य में है, किन्तु प्रयास करने पर भी वो आपको मिल नहीं पा रहा है । तो उपाय उसकी प्राप्ति में आपके लिए एक सहायक, मददगार सिद्ध हो सकता है । लेकिन यदि कोई वस्तु आपके भाग्य में लिखी ही नहीं गई है तो उसमें उपाय क्या कर सकता है? आप चाहे दिन रात उपाय करते रहें-----जब भाग्य में है ही नहीं तो उसमे उपाय क्या करेगा । अगर एक झोपडी में रहने वाला इन्सान कहे कि पंडित जी ! मैं बंगले में रहने का सुख लेना चाहता हूँ तो आप मुझे कोई ऎसा उपाय बता दीजिए कि मेरी ये इच्छा पूरी हो जाए------तो भई ज्योतिषी भी एक इन्सान ही है, कोई जादूगर नहीं कि हाथ घुमाया ओर चीज प्रकट हो गई । या कि वो कोई भगवान है जो कि आपके भाग्य को बदल देगा ।
ज्योतिष विद्या का कार्य इतना है कि इसके जरिए आप अपने भाग्य की सीमा का आँकलन कर सकते हैं, ताकि आप उसके जरिए अपने भावी जीवन के लक्ष्य निर्धारित कर सकें ओर उन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु सही मार्ग का चुनाव कर सकें--ओर उपाय का अर्थ ये है कि यदि हमारे वर्तमान/ संचित कर्मों के कारण उस मार्ग में किसी प्रकार की कोई विध्न बाधा उत्पन होती है तो उसके जरिए हम उन बाधाओं से मुक्ति पा सकें---- न कि अपने भाग्य में बदलाव का किसी प्रकार का भ्रम पालने लगें । 

(वैदिक ज्योतिष के अनुसार उपायों का प्रकार, उनका प्रयोजन तथा कोई सामान्य उपाय जिन्हे कि हम आम बोलचाल की भाषा में "टोटका" शब्द से जानते हैं, उनके बारे में किसी अन्य पोस्ट के माध्यम से बताने का प्रयास करूँगा। )

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ग्रह गोचर प्रणाली एवं राहू के धनु राशी में प्रवेश का वैश्विक् प्रभाव

>> Tuesday 17 November 2009

प्राय: चलन में देखा जाता है कि एक सामान्य व्यक्ति को अपनी नामराशी तो पता होती है किन्तु वो अपनी जन्मराशी, जन्मलग्न इत्यादि के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ होता है । लेकिन अपना भविष्य जानने की उत्सुकता, जिज्ञासावश वो चाहता है कि ज्योतिषी को केवल अपनी नामराशी बताए और ज्योतिषी हमारा भविष्य बाँच दे । ऎसी स्थिति में केवल ग्रह गोचर भ्रमण प्रणाली ही एक मात्र पूर्ण प्रणाली है । इसी कारण गोचर प्रणाली का चलन दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है  और यह प्रणाली एक ऎसी प्रणाली के रूप में पहचान पा रही है, जो तुरन्त ही व्यक्ति को उसके भविष्य के बारे में आंशिक जानकारी दे देती है ।

किसी भी व्यक्ति का जीवन गोचर में भ्रमण कर रहे ग्रहों से अछूता नहीं है । सभी कहीं न कहीं गोचर के ग्रहों की क्रिया प्रतिक्रिया का परिणाम ही भोगते हैं । किन्तु यह बात अपूर्ण् है । इसकी पूर्णता हेतु व्यक्ति विशेष की जन्मकुंडली को भी देखना परम आवश्यक है; अर्थात गोचरस्थ ग्रहों की जन्मकालीन ग्रह स्थिति से क्या क्रिया-प्रतिक्रिया है, इस पर विचार करना भी बहुत जरूरी है ।  आजकल कुछ विद्वान तो केवल ग्रह गोचर को देखकर ही भविष्य कथन करने लगे हैं--लेकिन यह एक बिल्कुल ही गलत चलन है । आप यदि ज्योतिष विद्या के अच्छे ज्ञाता हैं तो गोचर के माध्यम से चाहे सम्पूर्ण विश्व अथवा किसी राष्ट्र/क्षेत्र विशेष की सामाजिक , आर्थिक अथवा राजनैतिक इत्यादि स्थिति का भावी आंकलन तो कर सकते हैं । किन्तु उसका व्यक्तिगत प्रभाव क्या होगा ? यह जानने के लिए जन्मकालीन ग्रह स्थिति (जन्मकुंडली) के अतिरिक्त अन्य कोई माध्यम नहीं है ।
अब यदि कोई व्यक्ति किसी ग्रह के गोचर भ्रमण को लेकर व्यक्तिगत भविष्यकथन करता है तो ये ज्योतिष नहीं बल्कि ज्योतिष विद्या के नाम पर सिर्फ मजाक किया जा रहा है ।
चलिए अब बात करते हैं राहू के धनुराशी में प्रवेश की ।

राहू का धनु राशी में प्रवेश :-

 राहू का धनुराशी (उत्तराषाढा नक्षत्र) में प्रवेश हो चुका है, जिसके परिणामस्वरूप आगामी 13 दिसंबर 2009 तक भारतवर्ष में कहीं बम विस्फोट, अग्निकाँड, वायुयान दुर्घटना, जातीय/प्रांतीय संघर्ष अथवा उपद्रव होने का योग बन चुका है । नेपाल, चीन आदि देशों एवं आसाम-त्रिपुरा,अरूणाचल,मेघालय,मणिपुर,नागालैण्ड आदि  भारत के पूर्वोतर राज्यों में इसका प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देगा । इन राज्यों में किसी स्थान पर प्राकृ्तिक प्रकोप से भारी जनधनहानि के भी योग है । 19,22,27,28 एवं 29 नवम्बर को कश्मीर, भूटान, शिलांग,हिमाचल प्रदेश, एवं उत्तरप्रदेश में कहीं वायुवेग के साथ वर्षा व बून्दाबांदी होगी, शरद ऋतु का प्रभाव बढने लगेगा ।  भारतीय राजनीति में विशेष चिन्तनीय समस्याएं उपस्थित होंगी । अनुसूचित जाति,जनजाति एवं पिछडे वर्गों को( यथा आरक्षण इत्यादि) लेकर कोई मुद्दा गर्माने लगेगा ।
वैश्विक स्तर पर भी यह समय अभूतपूर्व कठिन परिस्थितियों वाला सिद्ध होगा । यवन (मुस्लिम) राष्ट्रों के लिए समय बहुत भयावह रहेगा, किसी विशिष्ट व्यक्ति की आकस्मिक मृ्त्यु से शोक व्याप्त होगा ।

1 दिसंबर को बुध और राहू की युति 9 दिसंबर के मध्य अफवाहों के साथ वायदा बाजार में एकतरफा जोरदार तेजी/मन्दी के रूख का कारण बनेगी । अत: जो व्यक्ति  COMODITY TRADING, STOCK MARKET संबंधित कार्य व्यवसाय में लगे हुए हैं, उन्हे थोडा अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। अन्यथा अप्रत्याशित हानि का सामना करना पड सकता है ।

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